फर्रुखाबाद। एक ओर जहां विकास के दावे मंचों और फाइलों में जोर-शोर से किए जा रहे हैं, वहीं जमीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर बयां कर रही है। विकास की गंगा बहाने के दावे करने वाले जिम्मेदारों की अनदेखी का शिकार बढ़पुर मंदिर के पीछे स्थित कई बीघे में फैला तालाब वर्षों से उपेक्षा झेल रहा है। यह तालाब आज न तो अपनी पहचान बचा पा रहा है और न ही आसपास के लोगों के लिए किसी उपयोग का रह गया है।

बताया जाता है कि बढ़पुर मंदिर के पीछे स्थित इस तालाब के सुंदरीकरण को लेकर करीब दो वर्ष पूर्व एक मसौदा भी तैयार किया गया था। उस समय उम्मीद जगी थी कि जल्द ही तालाब का कायाकल्प होगा, किन्तु यह उम्मीद भी अन्य कई योजनाओं की तरह फाइलों में ही दबकर रह गई। स्थिति यह है कि आज तक न तो तालाब की विधिवत नाप हो सकी है और न ही इसके सुंदरीकरण का कोई अंतिम डिजाइन तैयार हो पाया है।

वर्तमान में तालाब की हालत दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। इसमें आसपास के नालों का गंदा पानी सीधे आकर भर रहा है, जिससे पूरे वर्ष जलभराव की स्थिति बनी रहती है। गंदे पानी और कचरे के कारण तालाब दुर्गंध का केंद्र बन चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गंदगी के चलते मच्छरों और कीटों की भरमार हो गई है, जिससे संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा लगातार बना रहता है।

तालाब के किनारे बसे आवासों की परेशानी भी कम नहीं है। बरसात के दिनों में जलभराव की समस्या और गंभीर हो जाती है। कई बार पानी घरों के अंदर तक घुस जाता है, जिससे लोगों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद न तो तालाब की नियमित सफाई हो रही है और न ही किसी स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि विकास योजनाएं केवल कागजों में दौड़ रही हैं। बढ़पुर मंदिर तालाब का सुंदरीकरण भी उन्हीं योजनाओं में शामिल होकर अधर में लटका हुआ है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब दो साल बीत जाने के बाद भी नाप-जोख और डिजाइन तक तैयार नहीं हो सका, तो आखिर सुंदरीकरण कब होगा।

क्षेत्रवासियों की मांग है कि जिम्मेदार विभाग इस ओर गंभीरता से ध्यान दें और तालाब के सुंदरीकरण की प्रक्रिया को शीघ्र शुरू किया जाए। यदि समय रहते इस ओर कदम नहीं उठाए गए, तो यह तालाब न केवल बीमारियों का बड़ा केंद्र बनेगा, बल्कि आसपास के रहवासियों की समस्याएं भी और बढ़ती जाएंगी। अब देखना यह है कि बढ़पुर मंदिर के पीछे आंसू बहा रहा यह तालाब आखिर कब अच्छे दिनों का मुंह देख पाएगा।

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