दीक्षाभूमि नागपुर: 14 अक्टूबर 1956 – अंबेडकर द्वारा किए गए सबसे बड़े धर्मांतरण का प्रतीक

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हृदेश कुमार

आज 14 अक्टूबर, 2025 को हम याद कर रहे हैं उस ऐतिहासिक दिन को जब डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने नागपुर की दीक्षाभूमि पर अपने और 10 लाख अनुयायियों के साथ हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना कर भारतीय समाज में एक नई क्रांति की नींव रखी। यह न केवल धर्म परिवर्तन था, बल्कि सामाजिक समानता, न्याय और दलितों के अधिकारों के लिए एक विशाल आंदोलन का प्रतीक बन गया।
नागपुर की दीक्षाभूमि आज भी विश्वभर में बौद्ध धर्म और सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में खड़ी है। यह वही स्थल है, जहाँ 14 अक्टूबर 1956 को डॉ. अंबेडकर ने अपनी सार्वजनिक दीक्षा ली और लाखों अनुयायियों को बौद्ध धर्म में प्रवेश दिलाया। दीक्षाभूमि का स्थान इस घटना के कारण इतना महत्वपूर्ण बन गया कि आज यह केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक जागृति का केंद्र भी माना जाता है।
धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
1950 के दशक में भारत में जातिगत भेदभाव चरम पर था। दलित और पिछड़े वर्गों के लोग सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अवसरों से वंचित थे। डॉ. अंबेडकर ने समझा कि संविधान और कानूनों से सुधार जरूरी हैं, लेकिन समाजिक चेतना और आस्था के माध्यम से ही वास्तविक समानता स्थापित हो सकती है। बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय उन्होंने इसी सोच के साथ लिया – धर्म को इंसानियत, अहिंसा और न्याय के सिद्धांतों का वाहक बनाना।
14 अक्टूबर 1956 को दीक्षाभूमि नागपुर में इतिहास का एक अविस्मरणीय दृश्य देखने को मिला। डॉ. अंबेडकर ने स्वयं बौद्ध धर्म अपनाया और 10 लाख अनुयायियों को भी इस धर्म में दीक्षा दी। हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे, सभी ने मिलकर इस धर्मांतरण को सामाजिक समानता और मानव गरिमा की विजय के रूप में स्वीकार किया।
इस धर्मांतरण ने तत्कालीन भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डाला। यह कदम दलित समुदाय के लिए समानता और गरिमा की शुरुआत बन गया। बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार को नई ऊर्जा मिली और समाज में न्याय और अहिंसा का संदेश फैलाने में मदद मिली। आज भी दीक्षाभूमि एक ऐसा प्रतीक स्थल है जो याद दिलाता है कि धर्म केवल आस्था का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और अधिकारों की रक्षा का हथियार भी बन सकता है
आज 14 अक्टूबर को अंबेडकर के अनुयायी और समाज सुधारक पूरे देश में इस दिन को याद करते हैं। दीक्षाभूमि पर आयोजित कार्यक्रमों और मेमोरियल समारोहों के माध्यम से हम उनके जीवन और उनके द्वारा दिखाए मार्ग को स्मरण करते हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि समानता, न्याय और मानव गरिमा के लिए संघर्ष का मार्ग कभी आसान नहीं होता, लेकिन यह अत्यंत आवश्यक है।
डॉ. अंबेडकर की दीक्षाभूमि की यह घटना हमें यह संदेश देती है कि “सत्य, न्याय और समानता के लिए उठाई गई आवाज सदैव अमर रहती है।”

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