लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया पर जनता के भरोसे में निहित होती है। मंगलवार को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर इंडिया ब्लॉक के सांसदों का प्रदर्शन इसी व्यापक बहस का हिस्सा बन गया। संसद से निर्वाचन आयोग के मुख्यालय की ओर बढ़े विपक्षी नेताओं को पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर रोक दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर धरना दिया।
प्रदर्शन में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य विपक्षी नेता शामिल रहे। रास्ता रोके जाने के दौरान राहुल गांधी और कुछ अन्य नेताओं के बैरिकेडिंग पर चढ़ने के दृश्य भी सामने आए। बाद में कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिए जाने की खबर आई।
इस पूरे घटनाक्रम को केवल सत्ता और विपक्ष के बीच टकराव के रूप में देखना शायद पर्याप्त नहीं होगा। इसके केंद्र में वह सवाल है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए सबसे महत्वपूर्ण है,क्या आम मतदाता को चुनावी प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है?
विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण और फॉर्म-6 से संबंधित प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी है। विपक्ष इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और SIR को वापस लेने की मांग कर रहा है। दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग और केंद्र सरकार इन आरोपों को खारिज करते हुए मतदाता सूची के पुनरीक्षण को पात्र एवं अपात्र मतदाताओं की पहचान की प्रक्रिया बताते हैं।
यहीं से लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। यदि विपक्ष सवाल उठाता है तो उन सवालों का तथ्यात्मक और पारदर्शी उत्तर सामने आना चाहिए। वहीं राजनीतिक दलों की भी जिम्मेदारी है कि गंभीर आरोपों को प्रमाण और संवैधानिक प्रक्रिया के दायरे में रखें।
हाल के घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट की ओर से फॉर्म-6 में कथित बदलावों से जुड़े मामले पर रिकॉर्ड देखने और प्रक्रिया की वैधानिकता की जांच की बात सामने आई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विवाद केवल राजनीतिक मंच तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कानूनी और संस्थागत पहलू भी हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनाव आयोग, सरकार और विपक्ष—तीनों लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को सर्वोपरि रखें। सड़कों पर विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन विरोध का अंतिम उद्देश्य संस्थाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें और अधिक जवाबदेह एवं विश्वसनीय बनाना होना चाहिए।
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में एक-एक वोट केवल संख्या नहीं, बल्कि नागरिक की आवाज है। इसलिए मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम छूटना हो या किसी अपात्र व्यक्ति का नाम शामिल होना—दोनों ही गंभीर विषय हैं। इनसे जुड़े संदेहों का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि तथ्यों, पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीय प्रक्रिया से होना चाहिए।
दिल्ली का यह प्रदर्शन आने वाले दिनों में राजनीतिक रूप से कितना बड़ा रूप लेगा, यह अलग विषय है। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक जरूरी प्रश्न फिर सामने ला दिया है,लोकतंत्र में चुनाव जीतना जितना महत्वपूर्ण है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है चुनाव प्रक्रिया पर जनता का विश्वास बनाए रखना।
यही विश्वास लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव है और इसकी रक्षा की जिम्मेदारी सत्ता पक्ष तथा विपक्ष दोनों की समान रूप से है।


