
शरद कटियार
हर वर्ष 2 अक्टूबर को हम महात्मा गांधी की जयंती के साथ अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाते हैं। यह दिन केवल बापू को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने और यह विचार करने का भी दिन है कि जिस अहिंसा को गांधी जी ने अपने जीवन का हथियार बनाया, क्या वह आज हमारे व्यवहार का हिस्सा बन पाई है?
महात्मा गांधी ने दुनिया को यह संदेश दिया कि अन्याय का विरोध करने के लिए हिंसा आवश्यक नहीं है। सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए भी बड़े से बड़े परिवर्तन की नींव रखी जा सकती है। उनके लिए अहिंसा केवल किसी पर हाथ न उठाने तक सीमित नहीं थी। विचारों में कटुता न रखना, शब्दों से किसी को आहत न करना और विरोधी के प्रति भी मानवता बनाए रखना,अहिंसा का वास्तविक अर्थ यही है।
आज का समाज तकनीकी रूप से तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन सामाजिक और व्यक्तिगत स्तर पर असहिष्णुता की चुनौतियां भी दिखाई देती हैं। छोटी-सी बात पर विवाद, सोशल मीडिया पर अपशब्द, विचारों की असहमति को दुश्मनी में बदल देना और संवाद के स्थान पर आक्रोश को चुन लेना हमारे सामाजिक जीवन के लिए गंभीर संकेत हैं।
अहिंसा का अर्थ अन्याय के सामने चुप रहना नहीं है। गांधी जी ने स्वयं अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया, लेकिन संघर्ष का माध्यम सत्य और अहिंसा रखा। उन्होंने यह साबित किया कि दृढ़ता और अहिंसा एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
आज परिवार से लेकर समाज और सार्वजनिक जीवन तक संवाद की आवश्यकता है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन मतभेद को मनभेद में बदल देना किसी समस्या का समाधान नहीं। लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती यही है कि अलग-अलग विचारों के बावजूद बातचीत और सह-अस्तित्व का रास्ता खुला रहे।
अहिंसा की शुरुआत किसी बड़े आंदोलन से नहीं, बल्कि हमारे अपने व्यवहार से होती है। जब हम किसी छोटे व्यक्ति का सम्मान करते हैं, कमजोर की मदद करते हैं, किसी की मजबूरी का मजाक नहीं बनाते, क्रोध में संयम रखते हैं और असहमति के बावजूद सामने वाले की गरिमा का सम्मान करते हैं, तभी अहिंसा हमारे जीवन में उतरती है।
आज जरूरत इस बात की है कि अहिंसा को केवल किताबों, भाषणों और समारोहों तक सीमित न रखा जाए। इसे घर, विद्यालय, कार्यस्थल, समाज और सार्वजनिक जीवन की संस्कृति बनाया जाए।
बापू ने कहा था कि कमजोर व्यक्ति क्षमा नहीं कर सकता; क्षमा शक्तिशाली व्यक्ति का गुण है। इस विचार में अहिंसा की गहरी शक्ति छिपी है। हिंसा तत्काल प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन अहिंसा धैर्य, आत्मसंयम और चरित्र की मांग करती है।
अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने शब्दों और व्यवहार में संयम रखेंगे, दूसरों के विचारों का सम्मान करेंगे, विवादों का समाधान संवाद से खोजेंगे और अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठाएंगे।
महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाना नहीं है। सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी, जब हमारे आचरण में सत्य होगा, हमारे शब्दों में संयम होगा और हमारे व्यवहार में मानवता होगी।
अहिंसा कोई कमजोरी नहीं।
अहिंसा वह शक्ति है, जो मनुष्य को क्रोध पर विजय पाने और समाज को संघर्ष के बीच भी मानवता बचाए रखने का साहस देती है।
आज अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस पर यही हमारा संकल्प होना चाहिए,हिंसा नहीं, संवाद चुनेंगे।
घृणा नहीं, मानवता चुनेंगे।
असत्य नहीं, सत्य चुनेंगे।
बापू को नमन। अहिंसा के विचार को नमन।


