27.5 C
Lucknow
Tuesday, September 29, 2026

हल चलाने वालों के हाथ में कागज की हथकड़ी! दर्शिका शाक्य

Must read

 

किसान केवल खेत में अन्न उत्पन्न करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र की खाद्य-व्यवस्था की रीढ़ है। फिर भी विडम्बना यह है कि उसकी आवाज अनेक बार व्यवस्था के शोर में दब जाती है। प्रश्न यह है कि जिस व्यक्ति के श्रम से देश का अन्न-भंडार भरता है, उसकी समस्याएं सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में कितनी जगह पाती हैं?

एक किलोग्राम गेहूं से एक क्विंटल पैदावार करने वाला किसान आज भी ऋणग्रस्त है, जबकि उसी एक किलोग्राम गेहूं से लगभग 950 ग्राम दलिया तैयार कर बेचने वाला व्यक्ति मालामाल है। इसकी मूल वजह यह है कि आज भी किसानों के हाथ में अपनी उपज का मूल्य स्वयं निर्धारित करने का अधिकार नहीं है। वह दिन-रात परिश्रम कर अन्न तो उगाता है, किंतु उसकी फसल का मूल्य बाज़ार, बिचौलियों, मांग-आपूर्ति और अन्य आर्थिक शक्तियों द्वारा तय किया जाता है।

“जब खेत में अन्न उगाने वाला स्वयं अपने जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करने लगे, तब प्रश्न केवल कृषि का नहीं रहता; वह समाज, अर्थव्यवस्था, शासन और विधि—सभी के सम्मुख खड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।”

समय बदला, प्रश्न वही: ‘पूस की रात’ और आज का यथार्थ

प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ केवल हल्कू नामक किसान की कथा नहीं है, बल्कि यह भारतीय ग्रामीण जीवन की उस मौन वेदना का साहित्यिक चित्र है, जहां किसान अपने श्रम का स्वामी होते हुए भी इसके परिणामों पर पूर्ण अधिकार नहीं रख पाता। हल्कू के सामने तीन रुपये का प्रश्न है—जो उसके कंबल, श्रम, ऋण और सम्मान के बीच के संघर्ष का प्रतीक है। मुंशी प्रेमचंद का यह प्रश्न—”खेती क्यों न छोड़ दी जाए?”—आज भी अत्यधिक प्रासंगिक है।

आज भारतीय किसान के सामने परिस्थितियां और भी अधिक जटिल हो गई हैं। उसे निम्नलिखित गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

उत्पादन और लागत: बीज, उर्वरक की बढ़ती लागत, सिंचाई तथा विद्युत की आवश्यकता।

प्राकृतिक संकट: अनिश्चित मानसून, अतिवृष्टि अथवा अल्पवृष्टि, तथा कीट एवं रोग।

आर्थिक बाधाएं : फसल के उचित मूल्य की अनिश्चितता, ऋण की वापसी, और बाजार तक पहुंच का अभाव।

संरचनात्मक समस्याएं : भंडारण व परिवहन की कठिनाइयां तथा भूमिहीनता अथवा अल्पभूमिधारण।

कृषि-ऋण और संस्थागत विडम्बनाएं
किसान की विवशता का एक महत्वपूर्ण आयाम ‘पूस की रात’ में ऋणदाता के सामने हल्कू की लाचारी के रूप में केंद्रीय बिंदु बनता है। आज भी कृषि-ऋण व्यवस्था का एक अहम हिस्सा है। ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC) का उद्देश्य कृषकों को समय पर सुलभ संस्थागत ऋण उपलब्ध कराना है, जिसमें किराएदार कृषक, मौखिक पट्टेदार तथा बटाईदार भी सम्मिलित हैं। आवश्यकता इस बात की है कि किसान को अनौपचारिक ऋणों के अत्यधिक दबाव से पूर्ण सुरक्षा मिले।

इसके अतिरिक्त, गन्ने, मक्के और चावल से इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने का सीधा संबंध किसान, कृषि-भूमि और जल-संसाधन से है। अतः नीतिगत निर्णयों में इसका संतुलित प्रभाव देखना आवश्यक है।

संविधान के आलोक में किसान का जीवन

अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा): न्यायिक व्याख्या में “जीवन” को केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित न मानकर गरिमायुक्त जीवन से जोड़ा गया है। क्या अन्न, आवास, स्वास्थ्य और सुरक्षित आजीविका का समुचित संरक्षण किसान को मिल पा रहा है?

अनुच्छेद 14 और 38 (समानता और सामाजिक न्याय): कृषि-नीति और कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन भेदभावपूर्ण नहीं होना चाहिए। आर्थिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करना चाहिए।

अनुच्छेद 39(b) और 41 (संसाधनों का वितरण और राज्य की सहायता): भूमि, जल और प्राकृतिक संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग सामान्य हित में होना चाहिए।

बीज से बाज़ार तक: पांच-स्तरीय विधिक संरक्षण

किसान-केंद्रित विधि का उद्देश्य केवल संकट आने के बाद सहायता देना नहीं होना चाहिए। एक प्रभावी कृषि-विधि व्यवस्था में निम्नलिखित पाँच स्तरों पर संरक्षण अनिवार्य है:

पूर्व-संकट संरक्षण
उत्पादन-सुरक्षा
बाजार-सुरक्षा
आय-सुरक्षा
संकटोत्तर पुनर्वास
राजनीति, बिचौलिए और वास्तविक धरातल
“भाषण में राजा बने, किस्मत में बस धूल! मलाई खाए कौम जो, बोए नहीं एक फूल।”

जिस देश में अन्नदाता सुबह से शाम तक मिट्टी से सोना उगाने के लिए पसीना बहाता है, वहाँ ‘असली मुनाफा’ वे लोग बटोरते हैं जिनका खेत से कोई नाता नहीं होता। पसीना बहाने वाला मालिक अपनी फसल कोड़ियों के भाव बेचता है और उपभोक्ता उसे आसमान छूते दामों पर खरीदता है। बीच की मलाई वह बिचौलिया चाट जाता है जो केवल कागजों पर हेर-फेर करना जानता है।

नेताओं के चुनावी घोषणा-पत्रों से लेकर मंचों तक किसान प्रथम श्रेणी में विराजमान रहता है, किंतु वास्तविक पैकेजों के समय वह सरकारी एजेंडे के आखिरी पन्ने पर भी जगह नहीं पाता। यदि अमीर उद्योगपति को लग्जरी कार खरीदनी हो, तो बैंक पलकें बिछाकर लोन देते हैं, लेकिन गरीब किसान को ट्रैक्टर के लिए उच्च ब्याज दरों का सामना करना पड़ता है। राजनीति की इस नूराकुश्ती में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही किसानों के मुद्दों पर केवल बयानबाज़ी करते आए हैं।

प्रेमचंद ने जिस हल्कू को चित्रित किया था, वह हमें आज भी यह सोचने पर विवश करता है कि जिस व्यक्ति के श्रम से समाज का पेट भरता है, उसके जीवन की सुरक्षा का उत्तरदायित्व वस्तुतः किसका है? किसान को केवल “अन्नदाता” कह देना मात्र पर्याप्त नहीं है, उसके श्रम को उसका वास्तविक सम्मान और विधिक सुरक्षा मिलना ही राष्ट्र की सच्ची प्राथमिकता होनी चाहिए।

“संसद में चर्चा भयी, उड़े बहुत से तीर। मगर न बदली आज तक, हलधर की तकदीर।।”

(लेखिका दिल्ली-एनसीआर में एलएलबी थर्ड ईयर की छात्रा हैं )

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article