*परिकल्पना एवं संपादन: मोहम्मद आक़िब खांन*
*प्रस्तुति: यूथ इंडिया*
*फर्रुखाबाद:* प्राचीन पांचाल साम्राज्य के पौराणिक वैभव, महाभारत के प्रसंगों और बुद्ध के शांति-संदेशों के बाद 18वीं सदी की शुरुआत में इस माटी ने एक नया ऐतिहासिक मोड़ लिया। यह वह दौर था जब मुग़ल सल्तनत पतन की ओर अग्रसर थी और उत्तर भारत में नए क्षेत्रीय राज्यों का उदय हो रहा था। इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक साहसी और रणनीतिकार अफगान योद्धा का आगमन हुआ — नवाब मोहम्मद ख़ान बंगश, जिन्होंने अपनी दूरदर्शिता, अद्वितीय सैन्य क्षमता और प्रशासनिक कुशलता के बल पर गंगा-दोआब की इस ऐतिहासिक भूमि पर सन 1714 में ‘फर्रुखाबाद’ नगर की नींव रखी।
मोहम्मद ख़ान बंगश का संबंध पश्तून (अफगान) के बंगश कबीले से था। अपनी बुद्धिमत्ता, अद्वितीय सैन्य क्षमता और प्रशासनिक कुशलता के बल पर उन्होंने मुग़ल सेना में ऊँचा मक़ाम हासिल किया। मुग़ल गृहयुद्ध और उत्तराधिकार के संघर्षों में नवाब बंगश ने फर्रुखसियर का साथ दिया। जब फर्रुखसियर दिल्ली के तख्त पर बैठा, तो उसने मोहम्मद ख़ान बंगश की सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्हें ‘नवाब’ की उपाधि दी और इस समृद्ध दोआब क्षेत्र का मनसब सौंप दिया।
गंगा और रामगंगा के मध्य स्थित इस भूमि के सामरिक और व्यापारिक महत्व को देखते हुए नवाब मोहम्मद ख़ान बंगश ने सन 1714 (1126 हिजरी) में एक सुव्यवस्थित और आधुनिक नगर की नींव रखी। अपने संरक्षक मुग़ल बादशाह फर्रुखसियर के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्होंने इस नए शहर का नाम ‘फर्रुखाबाद’ रखा। नगर की सुरक्षा हेतु उन्होंने चारों ओर मजबूत शहरपनाह और ऐतिहासिक प्रवेश द्वारों का निर्माण कराया था।
नवाब बंगश ने फर्रुखाबाद को केवल सैन्य ठिकाने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे कला, व्यापार और कुटीर उद्योग का प्रमुख केंद्र बनाया। उन्होंने देश के विभिन्न क्षेत्रों से कुशल कारीगरों, बुनकरों और व्यापारियों को यहाँ आमंत्रित कर बसाया। उनके संरक्षण में हाथ की छपाई, ज़री-ज़रदोज़ी और पीतल के बर्तनों का उद्योग फला-फूला, जिसने आगे चलकर वैश्विक स्तर पर फर्रुखाबाद को ख्याति दिलाई।
नवाब मोहम्मद ख़ान बंगश ने फर्रुखाबाद को अपनी राजधानी बनाने के साथ-साथ यहाँ एक शाही टकसाल स्थापित की थी। यहाँ से जारी ‘फर्रुखाबादी रुपया’ तत्कालीन उत्तर भारत के प्रमुख व्यापारिक सिक्कों में माना जाता था।


