(प्रदीप विद्रोही -विभूति फीचर्स)
बिहार में बाढ़ केवल पानी के फैलने की कहानी नहीं है। यह घर छोड़ने, सामान बचाने, पशुओं को सुरक्षित रखने, बच्चों की पढ़ाई रोकने, बीमारी के खतरे और कई दिनों तक अस्थायी ठिकाने पर रहने की मजबूरी की कहानी भी है। इसलिए बाढ़ राहत को केवल इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि कितने परिवारों के खाते में कितनी रकम पहुंची या कितनी थालियां परोसी गईं। असली सवाल यह है कि बाढ़ के दौरान और पानी उतरने तक परिवारों की पूरी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होती है।
इसी संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े बिहार की राहत व्यवस्था में एक उल्लेखनीय बदलाव की ओर संकेत करते हैं। 2017 की भीषण बाढ़ के दौरान बड़ी संख्या में राहत शिविरों के साथ सामुदायिक रसोइयां भी संचालित थीं। 2025 और 2026 में राहत शिविरों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही, जबकि सामुदायिक रसोई और सीधे बैंक खातों में राहत राशि पहुंचाने की व्यवस्था का विस्तार हुआ। 2026 में 15 सितंबर तक लगभग 49.72 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित बताए गए और 8.27 लाख परिवारों के खातों में सात-सात हजार रुपये की अनुग्रह राहत भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई।
यहीं से स्पष्ट हो रह है कि बिहार की बाढ़ राहत नीति धीरे-धीरे ‘कैंप से कैश’ की ओर बढ़ रही है।
2017 की बाढ़ बिहार की सबसे गंभीर बाढ़ आपदाओं में थी। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष 4.21 लाख से अधिक लोग राहत शिविरों में रहे थे। उसी साल अलग-अलग समय पर राहत शिविरों की संख्या 1,238 से लेकर 1,358 तक दर्ज हुई और सामुदायिक रसोइयों की संख्या भी लगातार बढ़ती रही। अगस्त के एक चरण में 1,358 राहत शिविरों में 4.21 लाख लोग रह रहे थे और 2,569 सामुदायिक रसोइयों में लगभग 4.92 लाख लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा था। बाद के चरण में, जब पानी उतरने लगा, राहत शिविरों की संख्या तेजी से घटकर 35 रह गई थी, जबकि 164 सामुदायिक रसोइयों में उस समय भी हजारों लोगों को भोजन दिया जा रहा था। उसी दौरान करीब 4.92 लाख बाढ़ प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में 6,000 रुपये की राहत राशि पहुंचाने की जानकारी भी सामने आई थी। इससे एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है कि नकद सहायता या सामुदायिक रसोई बिहार की राहत व्यवस्था में बिल्कुल नई चीज नहीं हैं। बदलाव यह है कि समय के साथ राहत व्यवस्था में इनकी भूमिका बढ़ती गई है।
2025 में राज्य सरकार के अनुसार लगभग 38 लाख आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई और 6,51,602 परिवारों को सात-सात हजार रुपये की दर से डीबीटी के माध्यम से 456.12 करोड़ रुपये दिए गए। दूसरी ओर, 2025 के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार 23 जिलों में लगभग 48 लाख लोग प्रभावित हुए, जबकि 18 राहत केंद्र और 1,169 सामुदायिक रसोई संचालित हुई थीं।
सितंबर 2026 में सरकारी और सार्वजनिक प्रसारण स्रोतों के अनुसार 15 जिलों में 48 लाख से अधिक लोग प्रभावित थे। 1,251 सामुदायिक रसोइयों के माध्यम से 88 लाख से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जा चुका था, जबकि 13 राहत शिविरों में 12 हजार से अधिक लोग रह रहे थे। साथ ही पॉलीथिन शीट, सूखा राशन और पशु चारा भी वितरित किया गया।
यहां राहत शिविर और सामुदायिक रसोई के बीच अंतर समझना जरूरी है।
राहत शिविर केवल भोजन की व्यवस्था नहीं है। वह विस्थापित परिवार के लिए अस्थायी आवास, भोजन, पीने का पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवा और बच्चों तथा पशुओं की जरूरतों से जुड़ी व्यापक व्यवस्था हो सकता है। इसके विपरीत सामुदायिक रसोई का मूल उद्देश्य भोजन उपलब्ध कराना है। परिवार अपने घर, गांव, सड़क, तटबंध या किसी अन्य अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थान पर रह सकता है और वहां से भोजन प्राप्त कर सकता है।
बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में लोग अपने घर और पशुधन छोड़कर जाना नहीं चाहते, सामुदायिक रसोई का मॉडल व्यावहारिक भी हो सकता है। खासकर दियारा और नदी किनारे रहने वाली आबादी के लिए घर छोड़ना केवल मकान छोड़ना नहीं, बल्कि पशु, अनाज, कृषि उपकरण और जीवन की बची-खुची संपत्ति को असुरक्षित छोड़ना भी है। इसलिए कम राहत शिविर अपने आप में कम राहत का प्रमाण नहीं हैं। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि कम शिविरों का मतलब यह हो सकता है कि बड़ी संख्या में प्रभावित परिवारों को अपने स्तर पर रहने की व्यवस्था करनी पड़ रही है।
15 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 8,27,472 बाढ़ प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में सात हजार रुपये प्रति परिवार की दर से कुल 579.23 करोड़ रुपये की अनुग्रह राहत राशि डीबीटी के माध्यम से भेजने की शुरुआत की। सरकार ने कहा कि लाभार्थियों की पहचान और सत्यापन के बाद राशि सीधे खातों में भेजी जा रही है। यह व्यवस्था 2026 की शुरुआत भर नहीं है। 2025 में भी 6,51,602 परिवारों को सात हजार रुपये प्रति परिवार की दर से डीबीटी सहायता दी गई थी।
डीबीटी का एक स्पष्ट लाभ है,राहत राशि सीधे लाभार्थी तक पहुंचती है और परिवार अपनी तत्काल जरूरत के अनुसार उसका उपयोग कर सकता है,लेकिन नकद सहायता की अपनी सीमा भी है।
खाते में पैसा पहुंचने से सुरक्षित आवास अपने आप नहीं बनता। स्वच्छ पेयजल, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधा, बच्चों की पढ़ाई, पशुओं के लिए चारा और बाढ़ के बाद घर की सफाई जैसी जरूरतें केवल नकद भुगतान से पूरी नहीं होतीं। खासकर तब, जब बाजार तक पहुंच बाधित हो या परिवार का घर और खेत दोनों पानी में डूबे हों।
बाढ़ राहत की सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर उस समय दिखाई देती है जब बाढ़ की खबरें सुर्खियों से हटने लगती हैं।
पानी उतरने के बाद घर में कीचड़ और गंदा पानी रह जाता है। कुएं और चापाकल दूषित हो सकते हैं। सांप-बिच्छू का खतरा बना रहता है। पशुओं के लिए चारा कम पड़ता है। खेत में लगी फसल नष्ट हो जाती है। बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। परिवार के सामने रोजमर्रा की जिंदगी दोबारा शुरू करने की चुनौती होती है।
हाल की रिपोर्टों में ऐसे परिवारों का उल्लेख भी आया है जिन्हें घर डूबने के बाद तटबंधों या रेलवे लाइन के किनारे अस्थायी आश्रय बनाकर रहना पड़ा। कुछ परिवारों ने बांस और तिरपाल खरीदकर अपने लिए अस्थायी ठिकाना तैयार किया,इसीलिए राहत नीति का मूल्यांकन केवल कितना पैसा दिया गया, से आगे जाना चाहिए।
यदि परिवार को सात हजार रुपये मिल गए, लेकिन घर में लौटना सुरक्षित नहीं है, तो वह परिवार कहां रहेगा? यदि सामुदायिक रसोई बंद हो गई, लेकिन घर तक पहुंचना संभव नहीं है, तो भोजन की व्यवस्था कौन करेगा? यदि पशु बच गए, लेकिन चारा उपलब्ध नहीं है, तो नकद सहायता का कितना हिस्सा उस जरूरत को पूरा कर पाएगा?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल डीबीटी में नहीं है। राहत शिविरों की कम संख्या पर सरकार का तर्क है कि जितने शिविरों की जरूरत थी, उतने ही खोले गए। इसका एक व्यावहारिक आधार भी है। बहुत से लोग अपने घरों की निगरानी, पशुओं की देखभाल और संपत्ति की सुरक्षा के कारण राहत शिविरों में जाना नहीं चाहते।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक प्रभावित व्यक्ति को शिविर में ले जाना न तो हमेशा संभव है और न ही आवश्यक। यदि परिवार अपने गांव में रहना चाहता है और वहां भोजन, पेयजल, चिकित्सा, पशु चारा तथा अन्य जरूरी सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं, तो स्थानीय स्तर पर राहत उपलब्ध कराना अधिक उपयोगी हो सकता है।
लेकिन यह मॉडल तभी प्रभावी है जब राहत को लोगों तक पहुंचाने की व्यवस्था वास्तव में लगातार चलती रहे। 2017 और 2026 के आंकड़ों को साथ रखने पर राहत व्यवस्था में बदलाव का संकेत साफ दिखाई देता है। 2017 में बड़ी संख्या में लोग राहत शिविरों में थे और सामुदायिक रसोई उनके साथ-साथ चल रही थीं। आज सामुदायिक रसोई और डीबीटी सहायता का दायरा बड़ा है, जबकि राहत शिविरों में रहने वालों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है। 2025 में भी 18 राहत केंद्रों के साथ 1,169 सामुदायिक रसोइयों की व्यवस्था दर्ज हुई थी। इसलिए इसे पूरी तरह ‘कैंप से कैश’ में बदल चुकी नीति कहना शायद जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक यह कहना होगा कि बिहार की राहत व्यवस्था एक बहुस्तरीय और विकेंद्रीकृत मॉडल की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है,जहां कुछ लोग राहत शिविरों में रहते हैं, बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों तक सामुदायिक रसोई पहुंचती है और पात्र परिवारों को सीधे बैंक खातों में नकद सहायता दी जाती है।
यह बदलाव प्रशासन के लिए भी कई मायनों में महत्वपूर्ण है। बड़ी आबादी को एक जगह ठहराने की बजाय राहत को उनके निकट पहुंचाना संसाधनों और स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से अधिक लचीला हो सकता है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि परिवार की सुरक्षा और पुनर्वास की जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा उसके अपने कंधों पर भी आ सकता है।
बिहार में बाढ़ राहत की सफलता की कसौटी केवल राहत शिविरों की संख्या, सामुदायिक रसोई की संख्या या डीबीटी की राशि नहीं होनी चाहिए। कसौटी यह होनी चाहिए कि बाढ़ के दौरान कोई परिवार भूखा न रहे, असुरक्षित स्थान पर रहने को मजबूर न हो, पीने का पानी सुरक्षित मिले, बीमार होने पर इलाज उपलब्ध हो, पशुओं के लिए चारा मिले और पानी उतरने के बाद उसे अपने घर और आजीविका को फिर से खड़ा करने में सहायता मिले।
राहत का अर्थ केवल तत्काल मदद नहीं, बल्कि संकट से सामान्य जीवन की ओर लौटने की प्रक्रिया को सुरक्षित बनाना भी है।
बिहार की बाढ़ राहत व्यवस्था में कैंप से कैश तक का बदलाव यदि सचमुच हो रहा है, तो उसके साथ एक तीसरा शब्द भी जुड़ना चाहिए, वह है सुरक्षा। क्योंकि खाते में पैसा पहुंच जाना राहत की शुरुआत हो सकता है, राहत की पूरी मंजिल नहीं। साथ ही बिहार की बाढ़ राहत नीति का अगला सवाल इसलिए यह नहीं होना चाहिए कि ‘कैंप या कैश?’ बल्कि यह होना चाहिए कि कैंप, कैश और सुरक्षा,तीनों को जरूरत के मुताबिक कैसे जोड़ा जाए? *(विनायक फीचर)*


