– किसान की मेहनत पर दोहरी मार, फर्रुखाबाद में 12,415 किसान पहले ही बाढ़ से प्रभावित
फर्रुखाबाद। किसान के लिए इस साल मौसम और बाजार दोनों बड़ी चुनौती बनकर सामने आए हैं। पहले आलू के कमजोर भाव ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेरा और अब लगातार बारिश व तेज हवाओं ने तैयार धान की फसल को खेतों में गिरा दिया है। फर्रुखाबाद में अगस्त तक बाढ़ से 12,415 किसानों की फसलें प्रभावित होने और 7,258.85 हेक्टेयर कृषि भूमि में 33 प्रतिशत से अधिक नुकसान का आकलन किया गया था। नुकसान का अनुमान आठ करोड़ रुपये से अधिक लगाया गया था।
कायमगंज क्षेत्र में 25 सितंबर की रात और 26 सितंबर की सुबह तेज हवाओं के साथ हुई बारिश से तैयार अगैती धान खेतों में गिर गया। बालियों में दाने पड़ जाने के कारण पौधे भारी थे और तेज हवा के सामने टिक नहीं सके। किसानों को उत्पादन और दाने की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने की आशंका है।
फर्रुखाबाद मंडी में 24 सितंबर को उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार आलू का मॉडल भाव करीब 505 प्रति क्विंटल रहा। सितंबर 2026 का औसत भाव करीब 547 प्रति क्विंटल बताया गया है, जो सितंबर 2025 के करीब 863 के औसत से लगभग 36.5 प्रतिशत कम है।
यानी किसान के सामने स्थिति यह है कि आलू बेचने पर अपेक्षित कीमत नहीं मिली और अब धान की तैयार फसल मौसम की मार झेल रही है।
केंद्र सरकार ने विपणन वर्ष 2026-27 के लिए सामान्य धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,441 प्रति क्विंटल और ग्रेड-ए धान का 2,461 प्रति क्विंटल निर्धारित किया है।
सरकारी समर्थन मूल्य बढ़ने के बावजूद किसान की वास्तविक आय इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी कितनी फसल सुरक्षित बचती है, उसकी गुणवत्ता कैसी रहती है और उसे खरीद केंद्र पर समय से भुगतान मिलता है।
लगातार बारिश के कारण खेतों में पानी भरने से जुताई और अगली फसल की तैयारी भी प्रभावित हो रही है। पड़ोसी कन्नौज में भी बारिश और तेज हवाओं से धान खेतों में गिरने तथा आलू के खेतों में जलभराव की स्थिति सामने आई है।
एक तरफ बाजार में आलू का भाव कमजोर है, दूसरी तरफ धान की तैयार फसल पर बारिश का खतरा है। ऐसे में किसान की लागत, मेहनत और मौसम की अनिश्चितता के बीच उसकी आर्थिक गणित बिगड़ती जा रही है।
आलू ने बाजार में मारा, धान को बारिश ने गिराया—किसान की कमर पर दोहरी चोट है।
अब जरूरत केवल नुकसान दर्ज करने की नहीं, बल्कि खेत-खेत वास्तविक सर्वे, पारदर्शी क्षति आकलन और पात्र किसानों तक समय से राहत पहुंचाने की है। वरना किसान की मेहनत के साथ उसकी आर्थिक स्थिति भी एक और मौसम पीछे चली जाएगी।


