नई दिल्ली/लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष संगठन में संभावित बदलाव के बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर सियासी हलचल तेज है। भाजपा के सर्वोच्च निर्णयकारी मंच संसदीय बोर्ड के पुनर्गठन की चर्चा में योगी का नाम प्रमुखता से सामने आया है। हालांकि, पार्टी की ओर से अभी उनके नाम पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। अंदर खाने की माने तो भाजपा संसदीय बोर्ड में योगी आदित्यनाथ के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समेत कुछ अन्य नेताओं के नामों पर भी विचार हो रहा है। बीते माह में सामने आई रिपोर्टों में बोर्ड में तीन से चार मौजूदा मुख्यमंत्रियों को शामिल किए जाने की संभावना बताई गई थी।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण होगा क्योंकि मौजूदा संसदीय बोर्ड में कोई कार्यरत मुख्यमंत्री नहीं है। 2022 में भाजपा ने संसदीय बोर्ड का पुनर्गठन करते हुए तत्कालीन मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को बोर्ड से बाहर किया था।
योगी की संभावित एंट्री का सबसे बड़ा आंकड़ा उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटें हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक लोकसभा सीटों वाला राज्य है। ऐसे में यूपी के मुख्यमंत्री का भाजपा के शीर्ष निर्णयकारी निकाय में होना संगठन और राष्ट्रीय राजनीति दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण होगा।
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां भाजपा ने तेज कर दी हैं। पार्टी संगठनात्मक स्तर पर लगातार बैठकें और क्षेत्रीय प्रवास कर रही है। सितंबर में भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री एवं यूपी प्रभारी विनोद तावड़े ने गोरखपुर क्षेत्र में संगठन की तैयारियों का जायजा लिया।
दिलचस्प बात यह भी है कि यूपी भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने हाल में 2027 के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर कहा था कि इस संबंध में अंतिम फैसला भाजपा संसदीय बोर्ड करेगा।
यदि योगी को संसदीय बोर्ड में जगह मिलती है, तो उनकी भूमिका केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित संगठनात्मक दायरे से आगे बढ़कर भाजपा के शीर्ष निर्णयकारी मंच तक पहुंच जाएगी। संसदीय बोर्ड में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के चयन सहित महत्वपूर्ण संगठनात्मक और राजनीतिक फैसलों में भूमिका होती है।


