– डीआईएलआरएमपी 3.0 के तहत जमीन के कागज
– नक्शे और रजिस्ट्रेशन होंगे डिजिटल व एकीकृत
– पुराने अभिलेख भी होंगे ऑनलाइन, शहरी संपत्तियों के बनेंगे प्रॉपर्टी कार्ड
नई दिल्ली। जमीन से जुड़े दस्तावेजों को संभालने, पुराने अभिलेख खोजने और स्वामित्व से संबंधित जानकारी जुटाने की जटिल प्रक्रिया आने वाले समय में काफी आसान हो सकती है। केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया लैंड रिकॉर्ड्स मॉडर्नाइजेशन प्रोग्राम (डीआईएलआरएमपी) 3.0 की शुरुआत की है। इसके तहत देशभर में भूमि अभिलेखों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और जमीन से संबंधित अलग-अलग रिकॉर्ड को एकीकृत डिजिटल व्यवस्था में लाने की दिशा में काम किया जाएगा।
इस व्यवस्था की सबसे अहम विशेषता प्रत्येक जमीन को 14 अंकों का विशिष्ट भू-आधार नंबर दिया जाना है। यह नंबर जमीन की डिजिटल पहचान के रूप में काम करेगा। इसके जरिए संबंधित भूखंड के रिकॉर्ड, नक्शे और पंजीकरण से जुड़ी जानकारी को एक-दूसरे से जोड़ने की व्यवस्था विकसित की जाएगी।
आज भी जमीन से जुड़े कई पुराने रिकॉर्ड अलग-अलग कार्यालयों और अभिलेखागारों में उपलब्ध हैं। इन दस्तावेजों को तलाशने और उनका सत्यापन कराने में लोगों को काफी समय लग जाता है। रिकॉर्ड के डिजिटल होने से इस प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने की उम्मीद है।
डीआईएलआरएमपी 3.0 के तहत पुराने भूमि अभिलेखों को भी डिजिटल स्वरूप में लाने पर जोर दिया जाएगा। जमीन का रिकॉर्ड, भू-नक्शा और पंजीकरण संबंधी जानकारी एक-दूसरे से जुड़ने के बाद भूमि संबंधी सूचनाओं तक पहुंच आसान हो सकती है।
भूमि विवादों की एक बड़ी वजह रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर तथा अलग-अलग विभागों में उपलब्ध सूचनाओं का एक-दूसरे से जुड़ा न होना है। नई व्यवस्था में भूमि रिकॉर्ड और नक्शों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकीकृत करने की कोशिश होगी। इससे जमीन की पहचान और उससे संबंधित जानकारी को एक ही डिजिटल व्यवस्था में उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
पंजीकरण प्रक्रिया को भी भूमि रिकॉर्ड से जोड़ने की दिशा में काम किया जाएगा। इससे जमीन की खरीद-बिक्री के बाद रिकॉर्ड में होने वाले बदलाव को अधिक व्यवस्थित तरीके से दर्ज करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
योजना में शहरी क्षेत्रों की संपत्तियों को भी डिजिटल व्यवस्था से जोड़ने का प्रावधान है। शहरी संपत्तियों के प्रॉपर्टी कार्ड जारी किए जाने से संपत्ति की पहचान और उससे जुड़े विवरण को व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज किया जा सकेगा।
इससे भविष्य में संपत्ति से संबंधित सरकारी सेवाओं, सत्यापन और रिकॉर्ड प्रबंधन की प्रक्रिया को आसान बनाने में मदद मिल सकती है। हालांकि इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुराने रिकॉर्ड कितनी शुद्धता के साथ डिजिटल किए जाते हैं और अलग-अलग विभागों के आंकड़ों का मिलान किस स्तर तक किया जाता है।
जमीन के दस्तावेजों का डिजिटलीकरण केवल सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध पारदर्शिता और भूमि विवादों से भी है। यदि किसी भूखंड की पहचान, नक्शा, स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड और पंजीकरण की जानकारी एकीकृत डिजिटल व्यवस्था में उपलब्ध होती है तो रिकॉर्ड में गड़बड़ी और दस्तावेजों की हेराफेरी की गुंजाइश कम की जा सकती है।


