डॉ. विजय गर्ग
डिजिटल युग ने किशोरों के सीखने, संवाद करने और खाली समय बिताने के तरीके को बदल दिया है। स्मार्टफोन, टैबलेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन वीडियो और डिजिटल मनोरंजन अब दैनिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। तकनीक शिक्षा और रचनात्मकता के लिए अपार अवसर प्रदान करती है, लेकिन बढ़ता स्क्रीन टाइम एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा कर रहा है—क्या किताबें धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं?
ज्ञान, कल्पना और आलोचनात्मक चिंतन के विकास के लिए पढ़ने की आदत हमेशा महत्वपूर्ण रही है। किताबें पाठकों को एकाग्र होने, चिंतन करने और विचारों को गहराई से समझने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन आज कई किशोरों के लिए लंबे समय तक किताब पढ़ना कठिन होता जा रहा है। छोटी वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट, ऑनलाइन गेम और त्वरित डिजिटल मनोरंजन अधिक आकर्षक लगते हैं, क्योंकि वे तुरंत मनोरंजन और उत्तेजना प्रदान करते हैं।
सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी। डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार नई सामग्री उपलब्ध कराते हैं, जिससे उपयोगकर्ता एक वीडियो, संदेश या पोस्ट से दूसरे की ओर तेजी से बढ़ते रहते हैं। किताब पढ़ने के लिए एक अलग प्रकार के ध्यान की आवश्यकता होती है। इसके लिए धैर्य, एकाग्रता और लंबे समय तक किसी एक विचार के साथ जुड़े रहने की क्षमता चाहिए। जब किशोर तेज गति वाली डिजिटल सामग्री के अभ्यस्त हो जाते हैं, तो लंबे समय तक पढ़ना उन्हें कम रोचक या कठिन लग सकता है।
पढ़ने की आदत में कमी के व्यापक प्रभाव हो सकते हैं। नियमित पढ़ने से शब्दावली, भाषा कौशल, समझ और संवाद क्षमता बेहतर होती है। किताबें युवा मन को विभिन्न संस्कृतियों, अनुभवों और विचारों से परिचित कराती हैं। साहित्यिक रचनाएँ कल्पना और संवेदनशीलता को विकसित कर सकती हैं, जबकि गैर-साहित्यिक पुस्तकें जिज्ञासा और स्वतंत्र चिंतन को बढ़ावा देती हैं। जब पढ़ने की आदत कम होती है, तो इन लाभों पर भी असर पड़ सकता है।
हालाँकि, इसके लिए केवल तकनीक को दोष देना उचित नहीं है। डिजिटल उपकरण पढ़ने को भी बढ़ावा दे सकते हैं। ई-बुक्स, ऑनलाइन पुस्तकालय, शैक्षिक वेबसाइट, डिजिटल समाचार-पत्र और ऑडियोबुक ने ज्ञान को पहले से कहीं अधिक सुलभ बना दिया है। वास्तविक समस्या यह नहीं है कि किशोर स्क्रीन का उपयोग करते हैं, बल्कि यह है कि वे स्क्रीन पर क्या कर रहे हैं और कितने समय तक कर रहे हैं।
माता-पिता और विद्यालयों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। किशोरों को केवल मोबाइल छोड़ने के लिए कहने के बजाय उन्हें डिजिटल मनोरंजन और सार्थक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाना सिखाया जाना चाहिए। प्रतिदिन पढ़ने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित करना धीरे-धीरे इसे आदत में बदल सकता है। परिवार में ऐसा वातावरण बनाया जाना चाहिए जहाँ किताबें आसानी से उपलब्ध हों और बच्चे जो पढ़ रहे हैं, उस पर उनसे बातचीत की जाए।
विद्यालय भी पाठ्यपुस्तकों से आगे पढ़ने की संस्कृति विकसित कर सकते हैं। पुस्तक क्लब, पुस्तकालय, पठन प्रतियोगिताएँ, कहानी-वाचन और पुस्तकों पर चर्चा जैसी गतिविधियाँ पढ़ने को आनंददायक बना सकती हैं। किशोरों को अपनी रुचि के अनुसार किताबें चुनने की स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए—जैसे विज्ञान, जीवनी, इतिहास, साहित्य, रोमांच, खेल या समसामयिक विषय।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वयस्कों को स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। यदि बच्चे माता-पिता और शिक्षकों को लगातार मोबाइल देखते हुए, लेकिन शायद ही कभी किताब पढ़ते हुए देखते हैं, तो पढ़ने के महत्व का संदेश उन पर बहुत कम प्रभाव डालेगा।
उद्देश्य किताबों और तकनीक के बीच संघर्ष पैदा करना नहीं होना चाहिए। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। एक किशोर सीखने के लिए स्मार्टफोन का उपयोग कर सकता है और साथ ही कुछ समय मुद्रित किताब पढ़ने में भी लगा सकता है। महत्वपूर्ण बात है—संतुलन, उद्देश्य और आत्म-अनुशासन।
स्क्रीन गति देती है, जबकि किताबें गहराई देती हैं। स्क्रीन तुरंत जानकारी उपलब्ध करा सकती है, जबकि किताबें उस जानकारी के बारे में गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती हैं। तेजी से बदलती दुनिया में किशोरों को डिजिटल कौशल के साथ-साथ एकाग्रता, चिंतन और कल्पना की क्षमता की भी आवश्यकता है।
सवाल यह नहीं है कि किताबें समाप्त हो जाएँगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम अगली पीढ़ी को पढ़ने का आनंद खोजने के लिए पर्याप्त समय और प्रोत्साहन देंगे? स्वस्थ भविष्य के लिए कम तकनीक नहीं, बल्कि डिजिटल दुनिया और किताबों की दुनिया के बीच बेहतर संतुलन की आवश्यकता है।
डॉ. विजय गर्ग
रिटायर्ड प्रिंसिपल | एमिनेंट साइंटिस्ट
स्ट्रीट कौर चंद, MHR मलोट, पंजाब – 152107


