(डॉ.दीपक गोस्वामी-विनायक फीचर्स)
भू-राजनीति में धुआँ कभी केवल धुआँ नहीं होता। उसके पीछे कहीं बारूद जल रहा होता है, कहीं सत्ता का गणित बदल रहा होता है और कहीं भविष्य की शक्ति-संरचनाओं का नया नक्शा तैयार हो रहा होता है। पश्चिम एशिया से उठता धुआँ आज केवल युद्ध की आशंका नहीं दिखा रहा, बल्कि यह संकेत भी दे रहा है कि दुनिया की पुरानी सुरक्षा व्यवस्थाएँ नए समीकरणों के सामने पुनर्गठित हो रही हैं।
सात अगस्त 2026 को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने मक्का में संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते में यह प्रावधान है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति में उसे सभी पर हमला माना जाएगा। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण में इसे कई जगह इस्लामिक नाटो कहा गया, लेकिन यह इसका आधिकारिक नाम नहीं है। इसे नाटो जैसा पूर्ण सैन्य संगठन मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
इस समझौते की असली ताकत केवल कागज पर लिखी सामूहिक सुरक्षा नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग सामरिक आवश्यकताओं का एक बिंदु पर आना है। सऊदी अरब को अपनी ऊर्जा संपदा, समुद्री मार्गों और आर्थिक परिवर्तन की सुरक्षा चाहिए। तुर्किये पश्चिमी सैन्य व्यवस्था से जुड़े रहते हुए अपने क्षेत्रीय प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ सैन्य सहयोग करता रहा है और अपने आर्थिक तथा रणनीतिक हितों को भी इस संबंध से जोड़कर देखता है।
इसलिए इसे केवल धार्मिक एकता का समझौता समझना भूल होगी। इसके भीतर धर्म से अधिक सुरक्षा, ऊर्जा, सैन्य तकनीक, समुद्री मार्ग और क्षेत्रीय प्रभाव की राजनीति दिखाई देती है।
पाकिस्तान का इतिहास इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। 2015 में यमन संकट के दौरान पाकिस्तान की संसद ने सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान में सीधे शामिल होने से दूरी बनाई थी, हालांकि उसने सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा के समर्थन की बात कही थी। उस समय पाकिस्तान ने अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दी। आज वही पाकिस्तान सऊदी और तुर्किये के साथ सामूहिक रक्षा समझौते में खड़ा है। यह बदलती परिस्थितियों में बदलते रणनीतिक गणित का उदाहरण है।
सऊदी अरब के लिए यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह भविष्य में केवल तेल पर निर्भर नहीं रहना चाहता। विजन 2030 के माध्यम से वह अर्थव्यवस्था में विविधता, पर्यटन, प्रौद्योगिकी और निवेश का विस्तार कर रहा है। लेकिन आर्थिक परिवर्तन के लिए सुरक्षा आवश्यक है। लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और फारस की खाड़ी जैसे समुद्री मार्गों में अस्थिरता उसकी अर्थव्यवस्था को सीधे प्रभावित कर सकती है।
अब इस समझौते की पहली गंभीर परीक्षा सामने है।यमन के हूती हमलों के बीच सऊदी अरब की सुरक्षा चिंता फिर केंद्र में आ गई है। नौ सितंबर को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने संकेत दिया था कि यदि संघर्ष सऊदी क्षेत्र तक फैलता है तो समझौता सक्रिय हो सकता है। लेकिन 10 सितंबर को पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि फिलहाल समझौते के तहत किसी सैन्य प्रतिक्रिया पर चर्चा नहीं हुई है। पाकिस्तान ने हमलों की निंदा की और समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, लेकिन तत्काल सैन्य कार्रवाई घोषित नहीं की।
यही वह बिंदु है जहाँ समझौते की वास्तविक प्रकृति सामने आती है कि कागज पर सामूहिक सुरक्षा और जमीन पर सैन्य निर्णय, दोनों एक ही चीज नहीं हैं।
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम और भी महत्वपूर्ण है। भारत सऊदी अरब के साथ ऊर्जा, व्यापार, निवेश, प्रवासी भारतीय समुदाय और रक्षा सहयोग के व्यापक संबंध रखता है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने सऊदी अरब से लगभग 3.31 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया। इसलिए पश्चिम एशिया की अस्थिरता भारत से दूर घटने वाली घटना नहीं है। उसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार, महँगाई और आर्थिक विकास तक पहुँच सकता है। लेकिन भारत की चुनौती केवल सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। तुर्किये शंघाई सहयोग संगठन में पूर्ण सदस्य नहीं, बल्कि संवाद साझेदार है। दूसरी ओर ब्रिक्स का विस्तार हो चुका है और भारत 2026 में उसके शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। नई दिल्ली में ह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब पश्चिम एशिया का संघर्ष स्वयं ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग देशों के हितों और दृष्टिकोणों की परीक्षा ले रहा है।
यहीं से तस्वीर और स्पष्ट होती है। एक ओर मक्का समझौता पश्चिम एशिया में सामूहिक सुरक्षा का नया समीकरण बना रहा है। दूसरी ओर ब्रिक्स आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक दक्षिण से जुड़े मुद्दों पर अपनी भूमिका बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। शंघाई सहयोग संगठन यूरेशियाई क्षेत्र में सुरक्षा और सहयोग का अलग मंच है। पश्चिमी गठबंधन अपनी जगह मौजूद हैं। यानी दुनिया किसी एक शक्ति-केंद्र की ओर नहीं जा रही, बल्कि अनेक शक्ति-केंद्रों के बीच संतुलन की ओर बढ़ रही है।
ब्रिक्स का वर्तमान स्वरूप भी इस जटिलता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। इसका विस्तार ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के मूल समूह से आगे बढ़कर मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात तक हुआ है। सऊदी अरब की स्थिति को लेकर सावधानी आवश्यक है,उसे बिना शर्त पूर्ण सदस्य कहना सही नहीं होगा, क्योंकि उसकी भागीदारी को लेकर अभी भी अस्पष्टता है। यही भू-राजनीति का नया चेहरा है। एक देश एक मंच पर किसी के साथ खड़ा हो सकता है और दूसरे मंच पर अलग हितों के साथ काम कर सकता है। भारत भी इसी बदलती दुनिया के बीच खड़ा है। यही कारण है कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति किसी एक खेमे में पूरी तरह बंद होना नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना है।
भारत सऊदी अरब के साथ संबंध रख सकता है, तुर्किये के साथ संवाद कर सकता है, रूस के साथ रक्षा सहयोग बनाए रख सकता है, अमेरिका और यूरोप के साथ आर्थिक एवं तकनीकी साझेदारी बढ़ा सकता है और ब्रिक्स तथा शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर भी सक्रिय रह सकता है। यही बहुध्रुवीय कूटनीति की वास्तविक शक्ति है। इसका अर्थ तटस्थ रहना नहीं है। इसका अर्थ है- अपने निर्णय किसी दूसरे देश की इच्छा से नहीं, अपने राष्ट्रीय हित से तय करना।
इसी दृष्टि से मक्का समझौते को देखना चाहिए। यह भारत के विरुद्ध घोषित गठबंधन नहीं है। इसके पक्षों ने इसे किसी विशिष्ट देश के विरुद्ध लक्षित समझौते के रूप में प्रस्तुत नहीं किया है। लेकिन पश्चिम एशिया में यदि नई सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होती है, तो भारत को उसके प्रभावों का आकलन करना ही होगा। समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति, आतंकवाद, हथियारों की तकनीक और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन – इन सभी पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।
बांग्लादेश की ओर से भी इस समझौते में संभावित रुचि के संकेत आए हैं, लेकिन इसे अभी औपचारिक सदस्यता या निश्चित विस्तार मानना उचित नहीं होगा। यही सावधानी भू-राजनीति को समझने की पहली शर्त है। हर बयान गठबंधन नहीं होता और हर संभावना वास्तविकता नहीं बनती।
आज दुनिया पुराने ढंग से दो ध्रुवों में विभाजित नहीं हो रही। नए गठबंधन बन रहे हैं, पुराने गठबंधन अपने अर्थ बदल रहे हैं और देश एक साथ कई मंचों पर अपने हित साध रहे हैं। मक्का समझौता, ब्रिक्स का विस्तार और शंघाई सहयोग संगठन की सक्रियता – तीनों मिलकर एक बड़े परिवर्तन की ओर संकेत करते हैं। विश्व व्यवस्था अधिक बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर रही है।
भारत के सामने इसलिए केवल यह प्रश्न नहीं है कि कौन किसके साथ खड़ा है। बड़ा प्रश्न यह है कि बदलते शक्ति-संतुलन में भारत अपनी स्वतंत्र निर्णय क्षमता को कितना मजबूत रख सकता है। धुआँ इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह आग दिखाई देने से पहले संकेत देता है। मक्का का समझौता भी ऐसा ही संकेत है। यह अभी पूर्ण सैन्य महागठबंधन नहीं, लेकिन यह बता रहा है कि पश्चिम एशिया अपनी सुरक्षा को लेकर नए विकल्प तलाश रहा है। हूती संकट बता रहा है कि किसी समझौते की असली शक्ति उसके दस्तावेज में नहीं, संकट की घड़ी में लिए जाने वाले निर्णय में होती है। ब्रिक्स बता रहा है कि वैश्विक दक्षिण अपनी सामूहिक भूमिका बढ़ाना चाहता है। और भारत की विदेश नीति बता रही है कि आने वाली दुनिया में किसी एक शक्ति की छाया में खड़े रहना पर्याप्त नहीं होगा।
आने वाले वर्षों में घोषणाओं से अधिक महत्व संकट की घड़ी में लिए गए निर्णयों का होगा। गठबंधनों से अधिक महत्वपूर्ण होगा कि देश अपने हितों की रक्षा कितनी स्वतंत्रता और दूरदृष्टि से कर पाते हैं इसलिए भारत को न किसी गठबंधन से भयभीत होने की आवश्यकता है, न किसी शक्ति से अनावश्यक दूरी बनाने की। भारत की वास्तविक शक्ति यही है कि वह दूसरों के बनाए खेमों में अपना भविष्य खोजने के बजाय अनेक शक्ति-केंद्रों के बीच अपने हितों का संतुलन स्वयं तय करे।
क्योंकि भू-राजनीति में जो देश केवल दूसरों के बनाए नक्शे को पढ़ता है, वह अंततः किसी और की सीमा में खड़ा दिखाई देता है। भारत को इतिहास का दर्शक नहीं, बदलती विश्व-व्यवस्था का अपना नक्शा बनाने वाला देश बनना होगा। (विनायक फीचर्स)


