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Friday, September 11, 2026

7.8% की विकास दर से मजबूत दिखी अर्थव्यवस्था, लेकिन आंकड़ों पर चिंता

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– पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर रही जीडीपी वृद्धि
– नई गणना पद्धति को लेकर भी शुरू हुई बहस

नई दिल्ली। भारत की अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। 31 अगस्त को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार अप्रैल से जून के बीच देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही। पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दर्ज हुई यह तेज वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत मानी जा रही है।
हालांकि, बेहतर आर्थिक वृद्धि के आंकड़ों के साथ ही जीडीपी की गणना और आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर बहस भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों के बीच यह चर्चा है कि नई गणना पद्धति और बदले गए आंकड़ों के स्रोत से अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर किस हद तक सामने आती है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रवक्ता जूली कोजाक ने भी भारत समेत तेल आयात करने वाले देशों के सामने मौजूद चुनौती को रेखांकित किया है। उनका कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से उन देशों पर दबाव बढ़ता है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
तेल महंगा होने का असर देश के विदेशी भुगतान और सरकारी वित्त पर पड़ सकता है। हालांकि, आईएमएफ के मुताबिक भारत को यह झटका ऐसे समय लग रहा है जब उसकी आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत है। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए परिस्थितियां अपेक्षाकृत बेहतर मानी जा रही हैं।
सरकार का कहना है कि जीडीपी की नई सीरीज का उद्देश्य अर्थव्यवस्था की तस्वीर को पहले से अधिक सटीक तरीके से सामने लाना है। इसके तहत केवल आधार वर्ष में बदलाव नहीं किया गया है, बल्कि आंकड़ों के स्रोत और विभिन्न क्षेत्रों में इस्तेमाल किए जाने वाले आंकड़ों को भी अपडेट किया गया है।
नई व्यवस्था में कीमतों के प्रभाव को मापने के लिए ‘डबल डिफ्लेशन’ पद्धति का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसमें किसी वस्तु के उत्पादन की कीमत और उस वस्तु के उत्पादन में आने वाली लागत को अलग-अलग देखा जाता है। इससे वास्तविक उत्पादन वृद्धि का अधिक स्पष्ट आकलन करने की कोशिश की जाती है।
7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर निश्चित तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत है। मगर किसी भी आर्थिक आंकड़े की वास्तविक ताकत सिर्फ उसकी ऊंची दर में नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, गणना की विश्वसनीयता और जमीनी आर्थिक गतिविधियों से उसके मेल में होती है।

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