आगरा। शिक्षा विभाग के करोड़ों रुपये के टेंडर में मैनपावर सेवाएं देने वाली कंपनियों द्वारा कथित तौर पर फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र लगाए जाने का मामला सामने आया है। डीपक्राउन मैनपावर सर्विसेज के साथ हरिओम इंटरप्राइजेज के दस्तावेजों को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। आरोप है कि टेंडर में पात्रता साबित करने के लिए ऐसे अनुभव प्रमाण पत्र लगाए गए, जिनकी सत्यता पर जांच के दौरान सवाल उठे।
बताया जा रहा है कि संबंधित कंपनियों ने टेंडर प्रक्रिया में करीब 12.58 करोड़ रुपये के कार्य का अनुभव दर्शाया था। शिक्षा विभाग के करोड़ों रुपये के काम का ठेका हासिल करने के लिए लगाए गए इन दस्तावेजों की जांच के दौरान कथित गड़बड़ियां सामने आईं।
मामले में उस समय गंभीर सवाल खड़े हो गए, जब अनुभव प्रमाण पत्रों से जुड़े दस्तावेजों पर किए गए हस्ताक्षर को लेकर आपत्ति सामने आई। बताया जा रहा है कि बीएसए ने अपने नाम से किए गए कथित जाली हस्ताक्षर देखकर नाराजगी जताई। इससे दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया।
अगर किसी सरकारी अधिकारी के हस्ताक्षर का इस्तेमाल उसकी अनुमति या जानकारी के बिना किया गया है, तो यह मामला केवल टेंडर की पात्रता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दस्तावेजों की सत्यता और जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच का विषय भी बन जाता है।
गौरतलब है कि कथित फर्जीवाड़ा सामने आने के बावजूद किसी कंपनी के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं कराई गई? वहीं, अब तक किसी कंपनी को विभाग की ओर से ब्लैकलिस्ट किए जाने की कार्रवाई भी सामने नहीं आई है।
टेंडर प्रक्रिया में अनुभव प्रमाण पत्र किसी कंपनी की पात्रता तय करने का महत्वपूर्ण आधार होता है। ऐसे में यदि जांच में प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं तो संबंधित कंपनियों की भूमिका, दस्तावेज तैयार करने वालों और टेंडर प्रक्रिया में उनकी स्वीकार्यता की भी जांच जरूरी हो जाती है।
मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि जब दस्तावेजों को लेकर गंभीर आपत्तियां सामने आ चुकी थीं और कथित रूप से अधिकारी के जाली हस्ताक्षर तक का मामला सामने आया, तो फिर जिम्मेदार कंपनियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई।


