प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा हिंसा मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का मूल अधिकार है। विरोध शासन के लिए ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह काम करता है, इसलिए इसे मनमाने ढंग से दबाया नहीं जा सकता। कोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा आकृति चौधरी पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) रद्द करते हुए उसे तत्काल राहत दी।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस की कार्रवाई में गंभीर विरोधाभास पाया। कोर्ट के मुताबिक आकृति को 11 अप्रैल 2026 को हिरासत में लिया गया था, जबकि नोएडा में हिंसा और आगजनी 13 अप्रैल को हुई। ऐसे में अदालत ने सवाल उठाया कि घटना से दो दिन पहले हिरासत में लिए गए व्यक्ति को बाद की हिंसा के लिए जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि पुलिस गंभीर आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य या वीडियो पेश नहीं कर सकी। बीएनएसएस की धारा 130 के तहत जारी नोटिस भी गिरफ्तारी के बाद तैयार किया गया औपचारिक दस्तावेज पाया गया। अदालत ने गौतमबुद्ध नगर के जिलाधिकारी द्वारा एनएसए लगाने की कार्रवाई को अत्यंत क्रूर और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कड़े निवारक कानूनों का इस्तेमाल सामान्य आपराधिक मामले में जमानत रोकने के विकल्प के रूप में नहीं किया जा सकता। बिना पुख्ता साक्ष्य किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर चोट पहुंचाने की स्थिति में अदालतें मूकदर्शक नहीं बनी रहेंगी।
अदालत ने राज्य सरकार को आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि इसकी भरपाई सरकारी खजाने से नहीं होगी। जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से राशि वसूली जाएगी। जिलाधिकारी और शुरुआती रिपोर्ट तैयार करने वाले थाना प्रभारी समेत संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के भी निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और 19(1)(बी) का उल्लेख करते हुए कहा कि नागरिकों को बिना हथियार शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने और विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। अदालत की यह टिप्पणी पुलिस कार्रवाई और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


