शरद कटियार
सितंबर की शुरुआत ही आम आदमी के लिए महंगाई की चिंता बढ़ाने वाली खबरों के साथ हुई है। दूध महंगा हो रहा है, चीनी की कीमतों पर सरकार को जमाखोरी रोकने के लिए सख्ती करनी पड़ रही है और दूसरी ओर पेट्रोल-डीजल के निर्यात पर कर बढ़ाया गया है। सरकार भले ही यह स्पष्ट कर रही हो कि घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कर दरों में कोई बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन महंगाई के दौर में हर नया आर्थिक फैसला जनता की जेब और रसोई के बजट से जुड़ जाता है।
मुंबई में दूध की कीमत में नौ रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी निश्चित रूप से मामूली नहीं है। दूध ऐसी वस्तु है जिसकी कीमत बढ़ने का असर केवल चाय के कप तक सीमित नहीं रहता। इससे घरों के साथ-साथ मिठाई, दही, पनीर और अन्य दुग्ध उत्पादों की लागत भी बढ़ती है। दूध उत्पादकों की बढ़ती लागत और पशु चारे के महंगे होने की समस्या वास्तविक है, लेकिन सवाल यह है कि बढ़ी हुई लागत का पूरा बोझ आखिर उपभोक्ता पर ही क्यों आए?
चीनी को लेकर सरकार का भंडारण सीमा घटाने का फैसला भी महत्वपूर्ण है। यदि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा कर कीमतें बढ़ाने की कोशिश हो रही है तो जमाखोरी पर कार्रवाई जरूरी है। लेकिन केवल भंडारण सीमा तय कर देना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि खेत से बाजार तक पूरी आपूर्ति व्यवस्था पारदर्शी रहे और बिचौलियों की मनमानी पर प्रभावी रोक लगे।
पेट्रोल के निर्यात पर 1.50 रुपये प्रति लीटर नया कर और डीजल पर कुल शुल्क में बढ़ोतरी को सरकार घरेलू आपूर्ति बनाए रखने के उपाय के रूप में देख रही है। यह तर्क अपनी जगह उचित है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर कंपनियां अधिक लाभ के लिए निर्यात बढ़ा सकती हैं, जिससे घरेलू उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। लेकिन सरकार को यह भी देखना होगा कि ऐसे फैसलों का अप्रत्यक्ष असर परिवहन, माल ढुलाई और अंततः रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर न पड़े।
महंगाई केवल आंकड़ों का विषय नहीं है। यह उस परिवार की चिंता है जो महीने का राशन तय बजट में चलाने की कोशिश करता है। यह उस किसान की चिंता है जिसकी उत्पादन लागत बढ़ रही है और उस मजदूर की भी, जिसकी आय उसी गति से नहीं बढ़ रही।
सरकार को चाहिए कि महंगाई पर केवल तात्कालिक उपाय न करे, बल्कि उत्पादन, भंडारण, परिवहन और वितरण की पूरी व्यवस्था को मजबूत करे। जनता को राहत तभी महसूस होगी जब बाजार में कीमतें नियंत्रित हों और आमदनी के मुकाबले खर्च का बोझ कम हो।
लोकतंत्र में सरकार की नीतियों की असली परीक्षा कागज पर जारी अधिसूचनाओं से नहीं, बल्कि आम आदमी की रसोई और जेब में दिखाई देने वाले बदलाव से होती है। सितंबर की यह शुरुआत सरकार के लिए भी यही कसौटी लेकर आई है।


