सवाल सिर्फ सरकारी सुविधाओं का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसमें जनता कर देती है और व्यवस्था जनता की सेवा के लिए बनी है

प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत की आजादी को 80 वर्ष पूरे होने में अब एक साल बाकी है। 15 अगस्त 2027 को देश स्वतंत्रता के 80 वर्ष पूरे करेगा। इन आठ दशकों में भारत ने लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में लंबी यात्रा तय की है। लेकिन इस यात्रा के साथ एक सवाल आज भी बार-बार सामने आता है,लोकतंत्र में असली मालिक कौन है और जनसेवक किसके लिए है?
संविधान ने नागरिक को सर्वोच्च स्थान दिया। सरकारें जनता द्वारा चुनी जाती हैं और सरकारी संस्थाएं जनता के कर से चलती हैं। इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि सत्ता जनता की सेवा का माध्यम बने, स्वयं विशेषाधिकारों का केंद्र नहीं।
आजादी के समय भारत के सामने गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामंती ढांचे और आर्थिक असमानता जैसी बड़ी चुनौतियां थीं। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने नियोजित विकास, सार्वजनिक क्षेत्र और मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता अपनाया। लाल बहादुर शास्त्री का कार्यकाल छोटा रहा, लेकिन सादगी और जवाबदेही की उनकी छवि आज भी भारतीय राजनीति में उदाहरण मानी जाती है।
इसके बाद राजनीति का स्वरूप बदलता गया। सत्ता और राजनीतिक परिवारों का प्रभाव बढ़ा। इंदिरा गांधी के दौर में सरकार ने अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से पर राज्य की भूमिका मजबूत की। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1969 में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण था। बाद में 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, राष्ट्रीयकरण के पीछे ग्रामीण क्षेत्रों और कमजोर वर्गों तक बैंकिंग तथा ऋण पहुंचाने का उद्देश्य भी था।
इसलिए इतिहास को केवल ‘कब्जे’ के रूप में देखना अधूरा होगा। राष्ट्रीयकरण के पक्ष में सामाजिक और आर्थिक तर्क भी थे। लेकिन यह भी सच है कि लंबे समय तक अत्यधिक सरकारी नियंत्रण ने लाइसेंस, अनुमति और नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था पैदा की, जिसमें भ्रष्टाचार और बिचौलियापन बढ़ने की जमीन बनी।
आंकड़े इतिहास को समझने में मदद करते हैं। 1969 में 14 बड़े बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। 1980 में छह और बैंक सार्वजनिक क्षेत्र में आए। आरबीआई के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, 1990 के दशक की शुरुआत तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विस्तार देश के बड़े हिस्से तक हो चुका था। बाद में आर्थिक उदारीकरण के साथ निजी बैंकों को फिर प्रवेश मिला और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की जरूरत स्वीकार की गई।
यानी देश ने एक दौर में सरकारी नियंत्रण को समाधान माना और बाद में प्रतिस्पर्धा एवं बाजार सुधार को जरूरी समझा। इससे एक सबक साफ निकलता है,व्यवस्था चाहे सरकारी हो या निजी, असली कसौटी उसकी जवाबदेही और परिणाम हैं।
क्या सरकारी कर्मचारी और जनप्रतिनिधि जनता से ऊपर हैं।
एक आम नागरिक अपनी आय पर कर देता है। किसान मौसम, बाजार और लागत के जोखिम के साथ उत्पादन करता है। दुकानदार मंदी और प्रतिस्पर्धा झेलता है। निजी कर्मचारी नौकरी जाने की चिंता में काम करता है। स्वरोजगार करने वाला व्यक्ति बीमारी या कारोबार बंद होने की स्थिति में अपनी आय खो सकता है।
इसके विपरीत सरकारी सेवा में नौकरी की अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षा, वेतनमान, भत्ते, चिकित्सा, अवकाश और सेवानिवृत्ति संबंधी सामाजिक सुरक्षा जैसी व्यवस्थाएं होती हैं। हालांकि यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि हर सरकारी कर्मचारी को मुफ्त बंगला, गाड़ी या अन्य सभी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ऐसी सुविधाएं पद, विभाग और नियमों के अनुसार अलग-अलग होती हैं।
पेंशन के मामले में भी तस्वीर पहले जैसी नहीं है। केंद्र सरकार में 1 जनवरी 2004 से नए कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली लागू हुई, जिसने पुरानी परिभाषित लाभ वाली पेंशन व्यवस्था की जगह ली। 1 अप्रैल 2025 से केंद्र में एकीकृत पेंशन योजना का विकल्प भी लागू हुआ।
जनप्रतिनिधियों की सुविधाओं को लेकर भी समय-समय पर बहस होती रही है। केंद्र सरकार के अनुसार, 1 अप्रैल 2023 से सांसदों का मासिक वेतन 1.24 लाख रुपये, दैनिक भत्ता 2,500 रुपये, निर्वाचन क्षेत्र भत्ता 87,000 रुपये और कार्यालय खर्च के लिए अलग-अलग मदों में 50,000 रुपये तथा 25,000 रुपये निर्धारित हैं। पूर्व सांसदों की पेंशन 31,000 रुपये प्रतिमाह की गई है।
यहां सवाल यह नहीं होना चाहिए कि जनप्रतिनिधि को सुविधा मिले या नहीं। सवाल यह होना चाहिए कि सुविधा और जवाबदेही का अनुपात क्या है?
‘वन नेशन, वन फैसिलिटी’ को यदि नारे के बजाय नीति के रूप में देखा जाए तो इसका अर्थ हो सकता है,जनता और जनसेवक के बीच सुविधाओं की खाई कम हो, सरकारी खर्च पारदर्शी हो और हर सुविधा का सार्वजनिक हिसाब हो।
जिस प्रकार जनता से कर वसूला जाता है, उसी प्रकार सरकारी खर्च का भी प्रत्येक स्तर पर हिसाब होना चाहिए। कौन अधिकारी कितना वेतन लेता है, कौन-सी सुविधा किस नियम के तहत मिलती है, सरकारी वाहन का उपयोग कितना होता है, आवास पर कितना खर्च होता है और जनता को सेवा कितनी तेजी से मिल रही है,इन सभी का पारदर्शी मूल्यांकन होना चाहिए।
यहां बहस को तथ्यों के साथ रखना जरूरी है। आरक्षण का मूल आधार सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ापन तथा संविधान में निर्धारित विशेष प्रावधान हैं। इसलिए यह कहना कि केवल सरकारी सुविधाओं में समानता आने से आरक्षण की मांग समाप्त हो जाएगी, तथ्यात्मक रूप से सीधा निष्कर्ष नहीं है।
हां, अवसरों की समानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ने से सामाजिक तनाव और असमानता कम करने में मदद मिल सकती है।
भ्रष्टाचार के मामले में भी केवल कर्मचारी की सुविधा कम कर देना पर्याप्त नहीं होगा। भ्रष्टाचार रोकने के लिए डिजिटल सेवाएं, पारदर्शी भर्ती, समयबद्ध सरकारी सेवाएं, मजबूत निगरानी, संपत्ति की घोषणा, खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता और दोषी पाए जाने पर तेज कार्रवाई जरूरी है।
आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत में बहस सिर्फ इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि नेता और कर्मचारी को कितना मिलता है। बड़ी बहस यह होनी चाहिए कि जिस जनता के पैसे से पूरा सरकारी तंत्र चलता है, उसे बदले में कितनी गुणवत्तापूर्ण सेवा मिलती है।
जनता को अस्पताल में इलाज, स्कूल में शिक्षा, थाने में सम्मान, तहसील में समय पर काम, नगर निकाय में साफ-सफाई और सरकारी दफ्तर में बिना रिश्वत सेवा मिलती है या नहीं,लोकतंत्र की सफलता की असली परीक्षा यही है।
लोकतंत्र में नेता मालिक नहीं, जनता का प्रतिनिधि है। सरकारी कर्मचारी शासक नहीं, जनसेवक है। और करदाता केवल लाभार्थी नहीं, इस पूरी व्यवस्था का वित्तीय आधार है।
इसलिए 80 साल की आजादी पर सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए,सुविधाएं पद के हिसाब से हों, लेकिन जवाबदेही जनता के प्रति हो; अधिकार बड़े हों तो जिम्मेदारी उससे भी बड़ी हो; और सरकारी व्यवस्था का हर रुपया अंततः जनता के हित में खर्च हो।यही ‘मालिक बनाम नौकर’ की बहस का वास्तविक समाधान है,मालिक को और ताकतवर नहीं, बल्कि व्यवस्था को और अधिक जवाबदेह बनाना।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के राजनीतिक सलाहकार रहे हैं।


