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Tuesday, August 25, 2026

सदन में सवाल उठाना लोकतंत्र की ताकत है

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– बहिष्कार नहीं, बहस लोकतंत्र का हथियार
– चंद्रशेखर ने संख्या कम होने के बावजूद सत्ता को जवाब देने के लिए मजबूर किया

प्रो. एच. एन. शर्मा

लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने का नाम नहीं है। लोकतंत्र की असली ताकत उस व्यवस्था में है, जहां जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि सत्ता के सामने खड़े होकर सवाल पूछ सके, असहमति दर्ज करा सके और आम आदमी की आवाज को सदन के भीतर मजबूती से रख सके। संविधान को मानना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी अपनी बात को संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखना भी है।
जनता अपने प्रतिनिधियों को सदन में इसलिए भेजती है कि वे उसके सवालों का जवाब मांगें। किसान, मजदूर, युवा, व्यापारी, बेरोजगार, गरीब और आम नागरिक से जुड़े मुद्दे सदन में उठें। ऐसे में यदि प्रतिनिधि ही सदन से बाहर रहने का रास्ता चुन लें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि जिस मंच पर जनता ने अपनी आवाज भेजी है, उस मंच का इस्तेमाल आखिर कौन करेगा?
यही वह बिंदु है जहां पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन आज भी लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आता है।

चंद्रशेखर को भारतीय राजनीति में ‘युवा तुर्क’ के रूप में जाना गया। उनका राजनीतिक जीवन इस बात का प्रमाण है कि सदन में प्रभाव केवल संख्याबल से नहीं बनता। प्रभाव बनता है तथ्यों, तर्क, अध्ययन और निर्भीकता से।

वे 1957 में पहली बार राज्यसभा पहुंचे और 1962 तक सदस्य रहे। इसके बाद 1962 में फिर राज्यसभा के लिए चुने गए और 1977 तक उच्च सदन में रहे। 1977 में वे पहली बार लोकसभा पहुंचे। बाद में 1980, 1984 और 1989 में भी लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इस तरह संसद में उनका लंबा अनुभव केवल पदों की संख्या नहीं था, बल्कि सत्ता और विपक्ष दोनों पक्षों से लोकतांत्रिक संवाद का अनुभव था।
वे कांग्रेस में रहते हुए भी तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की नीतियों की आलोचना करने से पीछे नहीं हटे। आपातकाल के दौरान उनकी गिरफ्तारी और जेल जाना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता से असहमति उनके लिए व्यक्तिगत सुविधा का विषय नहीं थी।
चंद्रशेखर का राजनीतिक व्यक्तित्व किसी एक दल या सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं था। इंदिरा गांधी के दौर में उन्होंने सत्ता के भीतर रहते हुए भी सवाल उठाए और आपातकाल का विरोध किया। बाद में राजीव गांधी सरकार के समय भी वे अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सोच के लिए जाने गए।
उनकी राजनीति का मूल सिद्धांत स्पष्ट था,सत्ता में रहो तो जवाबदेह रहो और विपक्ष में रहो तो सवाल पूछो।
यही कारण है कि चंद्रशेखर को केवल पूर्व प्रधानमंत्री के रूप में देखना उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे भारतीय संसदीय राजनीति की उस परंपरा के प्रतिनिधि थे जिसमें नेता अपनी बात कहने के लिए सदन को सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मंच मानता था।
रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्ति,“सिंहासन खाली करो कि जनता आती है”भारतीय लोकतांत्रिक चेतना में सत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का प्रतीक रही है।

चंद्रशेखर की राजनीति में भी यही तेवर दिखाई देता था। उनका संघर्ष सत्ता हासिल करने भर का संघर्ष नहीं था। वे राजनीतिक व्यवस्था में आम आदमी की भूमिका और उसकी आवाज को महत्वपूर्ण मानते थे।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे असहमति को लोकतंत्र का दुश्मन नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ताकत मानते थे।
आज के राजनीतिक वातावरण में यह सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। किसी मुद्दे पर सरकार से असहमति हो सकती है। विपक्ष का विरोध लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है। सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।
यदि सदन में प्रश्नकाल है, शून्यकाल है, ध्यानाकर्षण है, चर्चा है, स्थगन प्रस्ताव जैसे संसदीय माध्यम हैं और समितियों के माध्यम से सरकार से जवाब मांगने की व्यवस्था है, तो इन मंचों का इस्तेमाल क्यों न किया जाए?
सदन का बहिष्कार कभी-कभी राजनीतिक दबाव बनाने का प्रभावी माध्यम हो सकता है, लेकिन यदि बहिष्कार लंबा चलता है तो उससे सबसे बड़ा नुकसान जनता के सवालों का होता है।
क्योंकि सरकार और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई के बीच जनता का मुद्दा कहीं पीछे छूट सकता है।
चंद्रशेखर का सबसे बड़ा संदेश यही था कि लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन साहस और तर्क उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
वे अकेले भी बोलते थे, लेकिन उनकी आवाज को अनदेखा करना सत्ता के लिए आसान नहीं होता था। वे प्रश्न पूछते थे, बहस करते थे और अपनी बात के लिए राजनीतिक कीमत चुकाने से भी पीछे नहीं हटते थे।
आज की राजनीति में जब सदन कई बार नारेबाजी, हंगामे और बहिष्कार की खबरों से भर जाता है, तब चंद्रशेखर की संसदीय शैली पर लौटकर देखना जरूरी हो जाता है।
सदन में उपस्थित रहकर सरकार को घेरना, आंकड़ों के साथ सवाल पूछना, जवाब मांगना और जनता के मुद्दे को रिकॉर्ड पर लाना,यह लोकतंत्र की सबसे मजबूत लड़ाई है।
जनता प्रतिनिधि को केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं चुनती। वह उसे अपनी समस्याओं का प्रतिनिधित्व करने के लिए चुनती है।
किसान की फसल का सवाल हो, युवाओं के रोजगार का सवाल हो, महंगाई हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, सड़क हो या स्थानीय प्रशासन की समस्या,इन सभी मुद्दों को सदन में उठाना जनप्रतिनिधि की संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।
विरोध का अधिकार भी संविधान देता है और अपनी बात कहने का अधिकार भी। इसलिए लोकतंत्र में यह संतुलन जरूरी है कि विरोध भी हो और संवाद भी, संघर्ष भी हो और सदन भी चलता रहे।
चंद्रशेखर की राजनीति हमें यही सिखाती है कि सत्ता से सवाल पूछने के लिए सदन से बाहर जाने की नहीं, बल्कि सदन के भीतर खड़े होने की जरूरत है।
लोकतंत्र में सरकार को मजबूत विपक्ष चाहिए और विपक्ष को मजबूत संसदीय रणनीति। केवल बहिष्कार से सरकार पर दबाव बन सकता है, लेकिन सदन में लगातार सवाल पूछने से सरकार को जनता के सामने जवाब देना पड़ता है।
इसलिए आज आवश्यकता ऐसे जनप्रतिनिधियों की है जो चंद्रशेखर की तरह अध्ययन करें, आंकड़ों के साथ बोलें, सत्ता से असहमति दर्ज कराएं और जनता के सवालों को सदन की कार्यवाही का हिस्सा बनाएं।
सदन लोकतंत्र का मंदिर कहने भर से नहीं बनता। वहां जनता की आवाज सुनाई दे, सत्ता से सवाल पूछे जाएं और जवाब मांगा जाए,तभी लोकतंत्र मजबूत होता है।
चंद्रशेखर की राजनीति का सार शायद एक ही वाक्य में समझा जा सकता है,सत्ता से लड़ना है तो लोकतंत्र के मैदान में लड़िए, क्योंकि जनता ने आपको उसी मैदान के लिए चुना है।
-लेखक पूर्व पीएम चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।

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