हाथों में विरोध के पोस्टर तो हैं, लेकिन जिसने युवाओं को आदर्श और लक्ष्य प्राप्ति का रास्ता दिखाया, वही स्वामी विवेकानंद आज युवाओं की सोच में नजर तक नहीं आते।

सूर्या पंडित
डिप्टी एडिटर यूथ इंडिया न्यूज ग्रुप
आज की सड़कों पर युवा दिखाई दे रहा है। कभी आरक्षण को लेकर, कभी रोजगार को लेकर, कभी शिक्षा और अधिकारों को लेकर। जेन-जी से लेकर जेन-अल्फा तक अपनी आवाज बुलंद कर रही है। हाथों में पोस्टर हैं, तख्तियां हैं, नारे हैं और व्यवस्था से सवाल हैं। लेकिन इन पोस्टरों की भीड़ में एक चेहरा लगातार गायब है—स्वामी विवेकानंद।
इस लगने लगा है कि युवा की सोच से स्वामी विवेकानंद लापता होते जा रहे हैं। प्रदर्शन में किसी के हाथ में महात्मा गांधी की तस्वीर है तो कोई बाबा साहब आंबेडकर का पोस्टर लेकर खड़ा है। कोई किसी राजनीतिक दल के नेता को अपना चेहरा बना चुका है तो किसी तख्ती पर विरोध के नाम पर ऐसी भाषा लिखी है, जिसे सार्वजनिक रूप से दोहराना भी मुश्किल हो। लेकिन जिस महापुरुष के नाम पर देश में हर साल युवा दिवस मनाया जाता है, उस स्वामी विवेकानंद की तस्वीर इन प्रदर्शनों में नहीं दिखाई देती है।
यह सिर्फ एक तस्वीर का गायब होना नहीं है, बल्कि यह उस पीढ़ी की प्राथमिकताओं पर सवाल है जो खुद को सबसे जागरूक और सबसे मुखर पीढ़ी मानती है।
विडंबना देखिए—12 जनवरी आते ही सोशल मीडिया पर स्वामी विवेकानंद छा जाते हैं। फेसबुक से लेकर इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप तक उनकी तस्वीरें, उनके विचार और युवा दिवस की शुभकामनाएं दिखाई देती हैं। ऐसा लगता है जैसे हर युवा विवेकानंद का अनुयायी हो। लेकिन युवा दिवस खत्म होते ही तस्वीरें भी गायब और विचार भी।
क्या स्वामी विवेकानंद सिर्फ एक दिन की सोशल मीडिया सामग्री बनकर रह गए हैं?
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को सिर्फ सपने देखने के लिए नहीं कहा था, बल्कि उन्हें अपने भीतर की शक्ति पहचानने, चरित्र निर्माण करने और देश के लिए खड़े होने का संदेश दिया था। उनका आह्वान था—उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।
आज का युवा लक्ष्य के लिए सड़क पर उतर रहा है, अपनी बात रखने के लिए संघर्ष कर रहा है, यह अच्छी बात है। लेकिन सवाल यह है कि उसके हाथ में विरोध का पोस्टर तो है, दिशा का पोस्टर क्यों नहीं?
अगर किसी आंदोलन में गांधी का पोस्टर हो सकता है, बाबा साहब की तस्वीर हो सकती है, किसी राजनीतिक नेता का चेहरा हो सकता है, तो स्वामी विवेकानंद क्यों नहीं? क्या इसलिए कि उनका नाम किसी राजनीतिक खेमे का हिस्सा नहीं है? या इसलिए कि उनके विचारों को पोस्टर पर लगाना आसान है, लेकिन जीवन में उतारना मुश्किल?
युवा शक्ति को केवल गुस्से की जरूरत नहीं होती, उसे दिशा भी चाहिए। आंदोलन को केवल भीड़ की जरूरत नहीं होती, उसे विचार भी चाहिए। हाथ में उठी तख्ती केवल किसी के खिलाफ न हो, उसमें यह भी लिखा होना चाहिए कि हम किस तरह का समाज चाहते हैं।
आज युवाओं के अपने आइडल स्वामी जी को नहीं बोलना चाहिए जिनके नाम से युवा जाने जाते हैं।


