लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय की वर्ष 2020 की भर्ती प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। भर्ती में समीक्षा अधिकारी के 13 और सहायक समीक्षा अधिकारी के 53 पद विज्ञापित किए गए थे। अब 238 पेज की बताई जा रही एसआईटी रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया जा रहा है कि निर्धारित पदों से अधिक अभ्यर्थियों को ज्वाइन कराया गया और बाद में प्रतीक्षा सूची के अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति दी गई।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सहायक समीक्षा अधिकारी के 53 पदों के मुकाबले 24 अतिरिक्त अभ्यर्थियों को ज्वाइन कराने का आरोप है। इसी तरह समीक्षा अधिकारी के लिए 13 पद निर्धारित होने के बावजूद 17 अभ्यर्थियों को ज्वाइन कराने की बात कही जा रही है। इसके बाद 24 अभ्यर्थियों की प्रतीक्षा सूची तैयार किए जाने और उसमें शामिल अभ्यर्थियों को भी ज्वाइन कराने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
मामले में यह भी आरोप है कि प्रतीक्षा सूची में प्रथम स्थान पर रहे 48 वर्षीय अभ्यर्थी को भी ज्वाइन कराया गया। उसे एक प्रभावशाली व्यक्ति का भाई बताए जाने का दावा किया जा रहा है। हालांकि इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। उम्र, रिश्तेदारी, प्रतीक्षा सूची में क्रम और नियुक्ति की स्थिति की पुष्टि मूल सरकारी अभिलेखों तथा एसआईटी रिपोर्ट के संबंधित पृष्ठों से होना जरूरी है।
भर्ती प्रक्रिया में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि विज्ञापन में पदों की संख्या निर्धारित थी तो उससे अधिक नियुक्तियां किस नियम और किस आधार पर की गईं। इसी तरह प्रतीक्षा सूची से नियुक्ति की प्रक्रिया क्या थी और क्या विज्ञापन एवं भर्ती नियमों में इसकी अनुमति थी, यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु है।
बताया जा रहा है कि विधानसभा एवं विधान परिषद की परीक्षा और भर्ती प्रक्रिया से संबंधित 238 पेज की एसआईटी रिपोर्ट में पूरे प्रकरण की जांच की गई है। रिपोर्ट में यदि चयनित अभ्यर्थियों, नियुक्तियों, प्रतीक्षा सूची और ज्वाइनिंग का दस्तावेजी विवरण मौजूद है तो उससे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
विधानसभा सचिवालय की वर्ष 2020 की भर्ती प्रक्रिया पहले भी विवादों में रही है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार भर्ती विज्ञापन संख्या 1/2020 में समीक्षा अधिकारी और सहायक समीक्षा अधिकारी समेत कुल 87 पद शामिल थे। भर्ती प्रक्रिया को लेकर न्यायालय में भी सवाल उठाए गए थे।
अब इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज 238 पेज की एसआईटी रिपोर्ट मानी जा रही है। रिपोर्ट के निष्कर्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि अतिरिक्त नियुक्तियां किन परिस्थितियों में हुईं, प्रतीक्षा सूची का इस्तेमाल किस आधार पर किया गया और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
भर्ती प्रक्रिया में एक-एक पद अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़ा होता है। इसलिए यदि निर्धारित पदों से अधिक नियुक्ति अथवा नियमों के विपरीत प्रतीक्षा सूची से ज्वाइनिंग के आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का सवाल नहीं रहेगा, बल्कि उन अभ्यर्थियों के अधिकारों का भी मामला होगा जो निर्धारित नियमों के तहत चयन की उम्मीद लगाए बैठे थे।
अब निगाह एसआईटी रिपोर्ट के उन पन्नों पर है, जिनमें भर्ती प्रक्रिया की वास्तविक तस्वीर दर्ज होने का दावा किया जा रहा है।


