– शहीद पंडित रामरेखा शर्मा समेत अमर क्रांतिकारियों ने दी सर्वोच्च आहुति
– अगले दिन बलिया ने अंग्रेजी सत्ता से खुद को स्वतंत्र घोषित किया
प्रो. एच. एन. शर्मा
बलिया, नई दिल्ली । इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें केवल तारीख नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र की आत्मा पर लिखी हुई अमिट इबारत बन जाती हैं। 18 अगस्त 1942 भी ऐसी ही तारीख है, जब बलिया के द्वाबा क्षेत्र में आजादी की ज्वाला इस कदर भड़की कि अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिल गई। बैरिया थाना अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध जनविद्रोह का केंद्र बना और तिरंगा फहराने की कोशिश में क्रांतिकारियों ने गोलियां सीने पर झेलकर शहादत दी।
अगले ही दिन यानी 19 अगस्त 1942 को बलिया ने अंग्रेजी शासन से खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया और चित्तू पांडेय के नेतृत्व में समानांतर शासन व्यवस्था कायम हुई। इसीलिए इतिहास में बलिया को ‘बागी बलिया’ कहा गया। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र की व्यवस्था कुछ दिनों तक चली और 23 अगस्त की रात अंग्रेजों ने दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।
लेकिन इस आजादी की कीमत बहुत भारी थी। बैरिया की धरती पर अनेक नौजवानों ने अपना खून बहाया और कई क्रांतिकारी जेल की यातनाओं में शहीद हुए।
बैरिया थाने पर उमड़ा था जनसैलाब
18 अगस्त 1942 को बैरिया थाना अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनआक्रोश का केंद्र बन गया। हजारों की संख्या में लोग थाने की ओर बढ़े। उद्देश्य था अंग्रेजी सत्ता के प्रतीक यूनियन जैक को हटाकर तिरंगा फहराना और थाने पर भारतीयों का अधिकार स्थापित करना।
जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, तनाव भी बढ़ता गया। अंग्रेजी शासन के प्रतिनिधियों और आंदोलनकारियों के बीच टकराव हुआ। गोली चली और देखते ही देखते बैरिया की धरती पर आजादी के दीवानों का खून बहने लगा। विभिन्न ऐतिहासिक विवरणों में शहीदों की संख्या को लेकर अंतर मिलता है—कुछ स्रोत 18, तो कुछ 19 शहीदों का उल्लेख करते हैं।
यही कारण है कि अखबार में शहीदों की संख्या को किसी एक आंकड़े के रूप में अंतिम सत्य लिखने के बजाय “18 से अधिक क्रांतिकारियों की शहादत” अथवा स्रोत के अनुसार संख्या देना अधिक उचित होगा।
बैरिया की इस महान गाथा में गंगापुर निवासी पंडित रामरेखा शर्मा का नाम भी अमर है। तस्वीर में दिए विवरण और उपलब्ध स्थानीय ऐतिहासिक सामग्री के अनुसार रामरेखा शर्मा उन क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया और बाद में जेल की यातनाएं सहीं।
उपलब्ध विवरणों के अनुसार रामरेखा शर्मा सहित गदाधर नाथ पांडेय और गौरीशंकर राय की जेल यातनाओं के दौरान मृत्यु हुई। यानी उनकी शहादत गोली से नहीं, बल्कि अंग्रेजी जेल की अमानवीय यातनाओं के बीच हुई।
यही अंतर उनकी शहादत को और मार्मिक बना देता है। गोली का सामना करते हुए प्राण देना एक क्षण का बलिदान था, लेकिन जेल की काल कोठरी में यातनाएं सहते हुए मातृभूमि के लिए जीवन न्योछावर कर देना भी उतना ही महान बलिदान था।
पंडित रामरेखा शर्मा की शहादत हमें बताती है कि स्वतंत्रता केवल रणभूमि में नहीं जीती गई थी। जेलों की अंधेरी कोठरियों में भी अनगिनत भारतीयों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी।
अगस्त क्रांति के दौरान बलिया का विद्रोह किसी एक थाने या कस्बे तक सीमित नहीं था। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि आंदोलनकारियों ने जिले के कई हिस्सों में अंग्रेजी प्रशासन को चुनौती दी। 17 और 18 अगस्त तक करीब 15 थानों पर हमले किए गए और कई स्थानों पर अंग्रेजी प्रशासन का प्रभाव समाप्त कर दिया गया। कुछ विवरणों में आठ थानों के जलाए जाने और 16 रेलवे स्टेशनों को नुकसान पहुंचाए जाने का भी उल्लेख मिलता है।
बांसडीह में भी हजारों लोगों ने थाना और तहसील को घेर लिया था। प्रशासनिक ढांचे को चुनौती देने वाली यह घटनाएं बताती हैं कि बलिया में अगस्त क्रांति केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं रह गई थी, बल्कि यह आम जनता का व्यापक विद्रोह बन चुकी थी।
18 अगस्त की बैरिया की शहादत और पूरे जिले में उठे जनविद्रोह ने अगले दिन इतिहास रच दिया। 19 अगस्त 1942 को बलिया ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया। चित्तू पांडेय के नेतृत्व में समानांतर शासन व्यवस्था बनी और इसे ‘स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र’ के रूप में जाना गया। हनुमानगंज कोठी को इसका मुख्यालय बनाया गया।
देश को आजादी मिलने में अभी पांच वर्ष बाकी थे, लेकिन बलिया ने अंग्रेजी हुकूमत को यह बता दिया था कि भारतीय जनता अब गुलामी की जंजीरों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
यही वह ऐतिहासिक तेवर था जिसने बलिया को ‘बागी बलिया’ की पहचान दी।
बैरिया की शहादत से जुड़े नामों में निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, नरसिंह राय, रामजन्म गोंड, रामप्रसाद उपाध्याय, मैनेजर सिंह, रामदेव कुम्हार, रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, धर्मदेव मिश्र, श्रीराम तिवारी, मुक्तिनाथ तिवारी, विक्रम सोनार और भीम अहीर जैसे नाम स्थानीय स्मृतियों में दर्ज हैं। इसके साथ जेल यातना में शहीद हुए रामरेखा शर्मा, गदाधर नाथ पांडेय और गौरीशंकर राय जैसे क्रांतिकारियों की गाथा भी इस इतिहास का हिस्सा है।
इन नामों को पढ़ना महज इतिहास पढ़ना नहीं है। यह याद करना है कि आज जिस लोकतंत्र, संविधान और स्वतंत्रता में हम सांस लेते हैं, उसकी नींव में ऐसे ही अनगिनत लोगों का त्याग शामिल है।
आज बैरिया का शहीद स्मारक उन बलिदानों की जीवित स्मृति है। हर वर्ष यहां शहीदों को श्रद्धांजलि दी जाती है और लोग उन वीरों को याद करते हैं जिन्होंने अपनी जवानी देश के नाम कर दी। हाल के वर्षों में भी शहीद स्मारक पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के परिवारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और स्कूली बच्चों ने पहुंचकर अमर शहीदों को नमन किया है।


