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प्रयागराज। समय से पहले रिहाई के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को सजा में छूट देने की शक्ति प्राप्त है, लेकिन इस संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी कैदी की रिहाई पर निर्णय लेने से पहले उपलब्ध अभिलेखों और मामले से जुड़े सही तथ्यों की पूरी तरह जांच किया जाना आवश्यक है।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह फैसला राम प्रताप सिंह की याचिका पर सुनाया। अदालत ने समय से पहले रिहाई की अर्जी को खारिज करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया और सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार कर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि याची की जेल में बिताई गई अवधि को सही तरीके से दर्ज नहीं किया गया था। इस पर हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजगी जताई। अदालत ने माना कि यदि किसी कैदी की वास्तविक जेल अवधि ही सही तरीके से निर्धारित नहीं की गई है तो उसके समय से पहले रिहाई के आवेदन पर उचित निर्णय लेना संभव नहीं है।
अदालत ने कहा कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते समय संबंधित प्राधिकारी को रिकॉर्ड पर उपलब्ध सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखना होगा। केवल अधूरी या गलत जानकारी के आधार पर लिया गया निर्णय न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं सकता।
हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज करने संबंधी 26 जून 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि मामले पर उपलब्ध रिकॉर्ड और सही तथ्यों के आधार पर दोबारा विचार किया जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत प्राप्त शक्ति महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसके इस्तेमाल के लिए निर्धारित प्रक्रिया और नियमों का पालन करना जरूरी है।
हाईकोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि अदालत के आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से एक महीने के भीतर याची के समय से पहले रिहाई के आवेदन पर नए सिरे से निर्णय लिया जाए।
अदालत ने अपने फैसले में यह संदेश भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की सजा में छूट अथवा समय से पहले रिहाई जैसे संवेदनशील मामलों में निर्णय केवल औपचारिक प्रक्रिया पूरी करके नहीं लिया जा सकता। संबंधित प्राधिकारी को रिकॉर्ड, जेल में बिताई गई वास्तविक अवधि और मामले के सभी प्रासंगिक तथ्यों की निष्पक्ष जांच करनी होगी।
हाईकोर्ट की टिप्पणी का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि समय से पहले रिहाई के मामलों में प्रशासनिक रिकॉर्ड की शुद्धता सीधे तौर पर कैदी के अधिकारों को प्रभावित करती है। अदालत ने साफ किया कि संवैधानिक शक्ति का प्रयोग करते समय सही तथ्य, उपलब्ध अभिलेख और निर्धारित नियम निर्णय का आधार होने चाहिए।
राम प्रताप सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने पुराने आदेश को निरस्त कर दिया है। अब सरकार को पूरे मामले की दोबारा समीक्षा कर निर्धारित समयसीमा में नया फैसला लेना होगा।


