(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)
बिहार में शराबबंदी को लेकर बहस फिर तेज है। सरकार इसे सामाजिक परिवर्तन की बड़ी उपलब्धि बताती है, जबकि जमीन पर शराब की उपलब्धता, होम डिलीवरी, तस्करी, जहरीली शराब, राजस्व नुकसान और कानून के क्रियान्वयन की विसंगतियां लगातार सवाल खड़े कर रही हैं, इसलिए अब शराबबंदी को नैतिकता के नारे से नहीं, उसके वास्तविक परिणामों से परखने का समय है।
सबसे सीधा सवाल है जब बिहार में शराब की बिक्री और सेवन प्रतिबंधित है, तो शराब घरों तक कैसे पहुंच रही है? जुलाई 2026 में शराब के खिलाफ करीब 1.25 लाख स्थानों पर छापेमारी और लगभग 6.94 लाख लीटर अवैध शराब की बरामदगी सरकार की सख्ती का प्रमाण है। लेकिन यही आंकड़ा दूसरा सच भी बताता है कि प्रतिबंध के बावजूद अवैध बाजार कितना बड़ा और सक्रिय है। निगरानी के लिए ड्रोन का इस्तेमाल हो रहा है, फिर भी शराब की आपूर्ति के रास्ते बंद नहीं हुए।
यही शराबबंदी की मूल विडंबना है। कानून ने दुकान बंद की, मांग नहीं। मांग बनी रही तो बाजार ने अपना रूप बदल लिया। खुले कारोबार की जगह भूमिगत नेटवर्क बना और कई जगह ग्राहक के बाजार जाने के बजाय शराब उसके दरवाजे तक पहुंचने लगी।
इसे केवल पुलिस की विफलता कहना आसान है, लेकिन समस्या उससे गहरी है। किसी वस्तु पर प्रतिबंध लगाना और उसकी सामाजिक मांग खत्म करना दो अलग बातें हैं। शराबबंदी की नीति ने पहले काम को प्राथमिकता दी, दूसरे पर अपेक्षित ध्यान कितना दिया गया,यही असली प्रश्न है।
शराबबंदी का उद्देश्य निस्संदेह गंभीर था। बिहार में महिलाओं ने शराब के खिलाफ लंबे समय तक आवाज उठाई। गरीब परिवारों की आय शराब में खत्म होने, घरेलू हिंसा और पारिवारिक तनाव की शिकायतें वास्तविक थीं। इसलिए शराबबंदी को केवल राजस्व नुकसान के तराजू पर तौलना गलत होगा लेकिन अच्छा उद्देश्य किसी नीति की सफलता का प्रमाण नहीं होता,सफलता परिणामों से देखी जाती है।
सरकार को अब स्पष्ट आंकड़ों के साथ बताना चाहिए कि शराबबंदी के बाद वास्तविक खपत कितनी घटी? परिवारों की बचत कितनी बढ़ी? महिलाओं के खिलाफ हिंसा में कितना बदलाव आया? कितने लोगों ने शराब छोड़ी? कितने लोग दूसरे नशों की ओर गए? अवैध कारोबार का आकार कितना बढ़ा? राज्य ने कितना राजस्व छोड़ा और शराबबंदी लागू करने पर कितना प्रशासनिक खर्च किया? जब तक इन सवालों का समग्र उत्तर नहीं मिलता, सफलता का दावा अधूरा रहेगा।
सबसे गंभीर खतरा जहरीली शराब है। वैध बाजार बंद होने के बावजूद यदि मांग बनी रहती है तो अवैध उत्पादक सक्रिय होते हैं। उन्हें गुणवत्ता, सुरक्षा या उपभोक्ता की जिंदगी की चिंता नहीं होती। बिहार में जहरीली शराब से हुई मौतों की घटनाएं इस खतरे को बार-बार सामने ला चुकी हैं। यहां प्रश्न शराब की दुकान खोलने या बंद रखने से आगे जाता है। प्रश्न यह है कि क्या ऐसी प्रतिबंध व्यवस्था स्वीकार्य है जिसमें मांग भूमिगत होकर उपभोक्ता को और अधिक खतरनाक उत्पाद की ओर धकेल दे? लेकिन इसका समाधान शराब की बिक्री फिर शुरू करना जरूरी नहीं है। समाधान है मौजूदा व्यवस्था की ईमानदार समीक्षा और नशामुक्ति की व्यापक नीति।
शराबबंदी का एक और गंभीर प्रभाव न्याय व्यवस्था पर पड़ा है। बड़ी संख्या में मामले दर्ज हुए, पुलिस और अदालतों पर बोझ बढ़ा। करीब दो लाख मामलों के न्यायिक बोझ का उल्लेख सामने आया है। यदि किसी कानून के कारण मुकदमों की संख्या बढ़ती जाए, जेल और अदालतें दबाव में रहें, पुलिस का बड़ा हिस्सा शराब की तलाश में लगा रहे और फिर भी शराब की होम डिलीवरी जारी रहे, तो सरकार को यह पूछना ही होगा कि कानून कहां प्रभावी है और कहां विफल।
किसी कानून की सफलता गिरफ्तारियों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। असली कसौटी सामाजिक परिवर्तन है। भ्रष्टाचार का सवाल भी यहीं जुड़ता है। प्रतिबंधित वस्तु का बाजार जितना बड़ा होगा, अवैध कमाई की संभावना उतनी ही बढ़ेगी। बिहार में शराब बाहर से आती है, सीमावर्ती इलाकों से गुजरती है और फिर शहरों-कस्बों तक पहुंचती है तो रास्ते में मिलीभगत की आशंका स्वाभाविक है। सरकार का दायित्व है कि वह ऐसी आशंकाओं को पारदर्शी कार्रवाई से खत्म करे।
केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि कितनी बोतलें जब्त हुईं और कितने लोग गिरफ्तार हुए। यह भी सामने आना चाहिए कि बड़े तस्कर कौन हैं, उनके नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ कैसे तोड़ी जा रही है और कार्रवाई छोटे विक्रेताओं तक सीमित तो नहीं रह गई। शराबबंदी के आर्थिक पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। शराब से मिलने वाला कर राज्यों के लिए बड़ा राजस्व स्रोत रहा है। बिहार ने सामाजिक उद्देश्य से इस आय को छोड़ने का निर्णय लिया। यह राजनीतिक रूप से साहसिक फैसला था। लेकिन राजस्व का त्याग तभी सार्थक है जब उसके बदले समाज को स्पष्ट और मापने योग्य लाभ मिले। यदि सरकार राजस्व खोती है, शराब की मांग बनी रहती है और अवैध कारोबारी उस मांग से मुनाफा कमाते हैं, तो आर्थिक समीकरण उलटा हो जाता है। सरकार का खजाना खाली, समानांतर बाजार की जेब भारी।
इसी संदर्भ में शराबबंदी हटाने की मांग की तुलना कोठे से करने वाले मंत्री दिलीप जायसवाल के बयान पर भी सवाल उठना चाहिए। शराबबंदी का समर्थन करना उनका अधिकार है लेकिन किसी नीति की समीक्षा मांगने वाले को नैतिक रूप से कठघरे में खड़ा करना लोकतांत्रिक बहस का स्वस्थ तरीका नहीं है।
दिलीप जायसवाल जी से सीधा सवाल है कि अगर शराब से राजस्व कमाना इतना ही अनैतिक था, तो 2005 के बाद बिहार में शराब की दुकानों का विस्तार किसके राज में हुआ? यह व्यक्तिगत आरोप नहीं, राजनीतिक स्मृति का सवाल है। सरकारें नीतियां बदल सकती हैं। कोई नीति एक समय उचित लग सकती है और बाद में उसके दुष्परिणाम सामने आने पर बदली जा सकती है। इसमें कोई दोष नहीं लेकिन बदली हुई नीति को नैतिक सत्य घोषित करने से पहले पुराने फैसलों की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
आज शराबबंदी पर नैतिकता का भाषण देने वालों को यह भी बताना चाहिए कि तब शराब से मिलने वाला राजस्व क्यों स्वीकार्य था। यदि परिस्थितियां बदली थीं तो आज शराबबंदी की समीक्षा मांगने वालों के सवालों को भी लोकतांत्रिक ढंग से सुनना चाहिए। दूसरी ओर, शराबबंदी हटाने के समर्थकों को भी ईमानदार होना होगा। केवल राजस्व बढ़ाने का तर्क पर्याप्त नहीं है। शराब की उपलब्धता बढ़ने के साथ सामाजिक नुकसान भी बढ़ सकते हैं इसलिए शराबबंदी खत्म करना कोई जादुई समाधान नहीं।
वास्तविक बहस यह होनी चाहिए कि राज्य नशे की समस्या से कैसे लड़े,केवल पुलिस और जेल के माध्यम से या शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, नशामुक्ति केंद्र, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक जागरूकता के जरिए?
यदि कोई व्यक्ति शराब छोड़कर दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जाता है तो समस्या खत्म नहीं होती, उसका रूप बदलता है। सिंथेटिक ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थों का फैलाव भविष्य में कहीं अधिक गंभीर संकट पैदा कर सकता है। इसलिए शराबबंदी को व्यापक नशामुक्ति नीति का हिस्सा बनाना होगा। बिहार को शराबबंदी का स्वतंत्र सामाजिक-आर्थिक ऑडिट कराना चाहिए। इसमें महिलाओं, स्वास्थ्य विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों, न्यायविदों, समाजशास्त्रियों, पुलिस अधिकारियों और प्रभावित परिवारों को शामिल किया जाए। सरकार के दावे और विपक्ष के आरोप दोनों को एक ही आंकड़े की कसौटी पर परखा जाए।
यदि शराबबंदी से परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरी है तो आंकड़ों के साथ बताया जाए। महिलाओं की जिंदगी बेहतर हुई है तो उसका प्रमाण सामने आए। यदि अवैध बाजार बढ़ा है तो उसके बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई हो। यदि कानून ने अदालतों पर असामान्य बोझ डाला है तो प्रक्रिया की समीक्षा हो।
बिहार को न शराबबंदी पर आत्ममुग्ध होने की जरूरत है, न उसे जल्दबाजी में खत्म करने की। उसे यह स्वीकार करना होगा कि कानून बना देना और सामाजिक परिवर्तन कर देना एक बात नहीं है। आज अगर शराब दुकान में नहीं, मोबाइल फोन के जरिए मिलती है, ग्राहक दुकान तक नहीं जाता, शराब उसके दरवाजे तक पहुंचती है,सरकार राजस्व से वंचित रहती है, लेकिन अवैध कारोबारी कमाते हैं,जहरीली शराब जान लेती है और अदालतें मुकदमों से भरती हैं तो वर्तमान मॉडल पर गंभीर सवाल उठेंगे ही।
असल सवाल शराबबंदी रहे या हटे, इतना भर नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या बिहार ऐसी नीति बना सकता है जो शराब की मांग घटाए, अवैध बाजार तोड़े, महिलाओं और परिवारों को सुरक्षा दे, दूसरे नशों को फैलने से रोके और कानून-व्यवस्था को भी कमजोर न करे?
इसका उत्तर नारों में नहीं, नीति की ईमानदार समीक्षा में मिलेगा। सत्ता को दूसरों को आईना दिखाने से पहले अपने इतिहास में भी देखना होगा। शराब से राजस्व लेने का दौर भी उसी इतिहास का हिस्सा है और शराबबंदी भी। इसलिए बहस शराब की नहीं, नीति की विश्वसनीयता और राजनीतिक ईमानदारी की है।
बिहार ने शराबबंदी का प्रयोग किया है। अब उसे इस प्रयोग का हिसाब भी देना चाहिए । जब तक मांग, अवैध आपूर्ति और उसके संरक्षण तंत्र पर एक साथ चोट नहीं होगी, बिहार की शराबबंदी का सबसे बड़ा सच यही रहेगा कि यहां शराब की दुकानें तो बंद रहेंगी पर साथ में उसकी अवैध रुप से होम डिलीवरी भी चालू रहेगी। (विनायक फीचर्स)


