दर्शिका शाक्य
आजादी के इतने साल बाद भी लैंगिक आधार पर होने वाली हिंसा बड़ी चुनौती बनी हुई है।
यह ऐसी सामाजिक समस्या है जो स्त्री अथवा पुरुष, किसी भी लिंग के व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है। हिंसा, उत्पीड़न, दुर्व्यवहार, शोषण तथा भेदभाव जैसी अनेक घटनाएं निजी एवं सार्वजनिक—दोनों ही क्षेत्रों में घटित होती हैं। ऐसी घटनाएं मानव के मौलिक अधिकारों, उसकी गरिमा, समानता तथा सामाजिक कल्याण को गंभीर रूप से आहत करती हैं। अतः लैंगिक हिंसा के उन्मूलन के लिए सुदृढ़ विधिक व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता तथा समावेशी शैक्षिक उपायों का समन्वित रूप से क्रियान्वयन आवश्यक है, जिससे प्रत्येक नागरिक के लिए अधिक सुरक्षित, न्यायपूर्ण एवं समानतामूलक समाज का निर्माण किया जा सके।
महिलाओं के अधिकारों की रक्षा हेतु स्थापित लैटिन अमेरिकी समिति (सीएलएडीईएम), जिसकी स्थापना वर्ष 1987 में लीमा में हुई तथा जिसके वर्तमान में इस क्षेत्र के दस से अधिक देशों में संबद्ध कार्यालय कार्यरत हैं, ने लैंगिक हिंसा के विधिक विश्लेषण में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस समिति ने पारिवारिक विधि, संवैधानिक विधि, श्रम विधि तथा मानवाधिकार संबंधी विषयों पर अनेक संगोष्ठियों एवं विचार-विमर्शों का आयोजन किया तथा अनेक शोध-अध्ययन प्रकाशित किए। इन सभी में विधि की ऐसी वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत की गई है, जो लैंगिक दृष्टिकोण को अपनाते हुए महिलाओं की आवश्यकताओं, अधिकारों एवं हितों को केंद्र में रखती है।
”समानता अभी भी बहुत दूर है। यदि हमें हमारा उचित अधिकार और न्यायसंगत भाग प्राप्त हो जाए, तो वही एक महान उपलब्धि होगी।”हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारे समाज की अनेक संस्थागत संरचनाएं पुरुषों द्वारा निर्मित तथा पुरुषों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित की गई हैं। परिणामस्वरूप अनेक व्यवस्थाएं, जो सामान्य अथवा स्वाभाविक प्रतीत होती हैं, वस्तुतः गहरे पैठे पितृसत्तात्मक ढांचे की अभिव्यक्ति हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय हमारे संविधान ने सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर तथा लैंगिक समानता की परिकल्पना करते हुए भारतीय समाज में व्यापक सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया। तब से आज तक हमारा सतत प्रयास संविधान में निहित समानता के आदर्श को व्यवहारिक रूप से स्थापित करना रहा है। जब विधिक व्यवस्था स्वयं पुरुष-केंद्रित दृष्टिकोण पर आधारित हो, तब असमान परिस्थितियों में स्थित व्यक्तियों पर समान विधि का औपचारिक रूप से समान अनुप्रयोग करना वस्तुतः न्याय का उपहास है। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि महिलाओं को सशस्त्र सेनाओं में राष्ट्र-सेवा का अवसर प्राप्त है, जबकि उनकी वास्तविक सेवा-शर्तें भिन्न एवं असमान हों। ऐसी सतही समानता संविधान की वास्तविक भावना के अनुरूप नहीं है; वह समानता को केवल प्रतीकात्मक बनाकर छोड़ देती है।
हमारे समाज में प्रायः यह मान लिया जाता है कि किसी स्त्री का सर्वोच्च गुण आज्ञाकारिता है, मानो उसका जीवन केवल किसी पुरुष की इच्छाओं एवं आदेशों का पालन करने के लिए ही हो। परन्तु किसी भी महिला को अपने जीवन के निर्णय लेने अथवा अपनी जीवन-शैली निर्धारित करने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। वास्तविक लैंगिक समानता तभी स्थापित होगी, जब किसी महिला की पहचान सर्वप्रथम एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में होगी, न कि केवल किसी की पुत्री, पत्नी अथवा पुत्रवधू के रूप में। और जो लोग यह प्रश्न करते हैं कि “स्त्री क्या है?”, उन्हें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि स्त्री कोई वस्तु अथवा संपत्ति नहीं है। वह एक स्वतंत्र मानव है, जिसकी अपनी चेतना, विचार, आकांक्षाएं, गरिमा तथा संवैधानिक एवं मानवीय अधिकार हैं।
स्त्री और पुरुष समाज के दो समान रूप से सशक्त स्तंभ हैं। इनमें से केवल एक को सशक्त बनाया जाए, तो समाज कभी भी समग्र रूप से विकसित नहीं हो सकता। वास्तविक विकास तभी संभव है, जब दोनों को समान अवसर, समान सम्मान तथा समान अधिकार प्राप्त हों। विचार में समाज द्वारा बालक एवं बालिका के मध्य किया गया भेदभाव अत्यंत अन्यायपूर्ण एवं अस्वीकार्य है।
भारतीय संविधान की प्रस्तावना “हम, भारत के लोग…” शब्दों से आरम्भ होती है। यहां “भारत के लोग” का आशय जाति,धर्म, लिंग तथा जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव से परे प्रत्येक नागरिक है। जब संविधान की प्रस्तावना संपूर्ण जनता का उल्लेख करती है, तब यह स्वाभाविक है कि उसकी व्याख्या भी व्यापक, समावेशी तथा लैंगिक समानता के सिद्धांत पर आधारित हो।
संविधान प्रत्येक स्त्री एवं पुरुष को समान प्रतिष्ठा, समान अवसर तथा समान अधिकार प्रदान करने का संकल्प व्यक्त करता है। साथ ही यह प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा की रक्षा का आश्वासन देता है, जिसमें महिलाओं की गरिमा भी समान रूप से समाहित है।
आज स्त्री और पुरुष की क्षमता, योग्यता, प्रतिभा अथवा स्वप्नों में कोई अंतर नहीं है। फिर भी जब कोई महिला घर से बाहर निकलती है, तो उसे प्रायः यह कहकर सावधान किया जाता है—”याद रखना, तुम परिवार की इज्जत हो; ऐसा कोई कार्य मत करना जिससे परिवार का सम्मान आहत हो जाए।” परन्तु किसी पुरुष से यह क्यों नहीं कहा जाता—”जब तुम घर से बाहर जाओ, तो किसी अन्य की बेटी का अनादर मत करना; किसी भी महिला के प्रति कुदृष्टि मत रखना; प्रत्येक स्त्री का सम्मान करना।” महिलाओं की गरिमा एवं सुरक्षा का उत्तरदायित्व केवल महिलाओं पर नहीं डाला जा सकता। प्रत्येक पुरुष का भी समान नैतिक एवं सामाजिक दायित्व है कि वह महिलाओं का सम्मान करे तथा उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने में अपनी भूमिका निभाए। यदि वास्तविक परिवर्तन लाना है, तो सबसे पहले हमें अपनी सोच एवं मानसिकता को परिवर्तित करना होगा।
स्त्री और पुरुष अपनी पीड़ा को भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं, किन्तु जब वे वास्तव में दुखी होते हैं, तो उनकी आंखों से बहने वाले आंसू समान होते हैं। वे अपनी प्रसन्नता को अलग-अलग प्रकार से व्यक्त कर सकते हैं, किन्तु जब वे हृदय से प्रसन्न होते हैं, तो उनके चेहरे पर खिलने वाली मुस्कान एक समान होती है। भावनाएं किसी लिंग को नहीं पहचानतीं; वे केवल मानवता को पहचानती हैं।
भारत ने चंद्रमा तक पहुंचकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धियां प्राप्त की हैं। किन्तु किसी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति का मूल्यांकन केवल अंतरिक्ष अभियानों अथवा आर्थिक विकास के आधार पर नहीं किया जा सकता। किसी विकसित राष्ट्र की सच्ची पहचान यह है कि उसकी प्रत्येक महिला रात्रि में भी निर्भय होकर घर से बाहर निकल सके, सुरक्षित अपने घर लौट सके तथा उसके मन में भय का कोई स्थान न हो।
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि जब कोई महिला औषधालय से मासिक धर्म के दौरान उपयोग किए जाने वाले स्वच्छता नैपकिन जैसी मूलभूत आवश्यकता की वस्तु खरीदने जाती है, तो उसे प्रायः काले प्लास्टिक अथवा समाचार-पत्र में इस प्रकार लपेटकर दिया जाता है, मानो वह कोई लज्जास्पद वस्तु हो। इसके विपरीत तंबाकू एवं सिगरेट जैसे उत्पाद, जिनके कारण प्रतिवर्ष लाखों लोगों का जीवन नष्ट होता है तथा जो गंभीर स्वास्थ्य-हानि के उत्तरदायित्व हैं, खुलेआम प्रदर्शित एवं विक्रय किए जाते हैं।
जिस दिन भारत की प्रत्येक महिला बिना किसी भय, असुरक्षा अथवा सामाजिक बंधन के, दिन अथवा रात्रि के किसी भी समय उसी आत्मविश्वास एवं स्वतंत्रता के साथ चल सकेगी, जिस प्रकार एक पुरुष चलता है, उसी दिन हम यह गर्वपूर्वक कह सकेंगे कि भारत ने केवल वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति ही नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक प्रगति भी प्राप्त कर ली है।
महिलाओं को समान अधिकार, समान गरिमा तथा समान अवसर प्रदान करना केवल एक नैतिक दायित्व ही नहीं, अपितु एक अनिवार्य सामाजिक संकल्प एवं संविधान द्वारा प्रदत्त पवित्र उत्तरदायित्व भी है। यही समावेशी विकास, सामाजिक न्याय तथा राष्ट्र के समग्र एवं सतत उत्थान का आधार है।
”मानवाधिकार ही महिला अधिकार हैं और महिला अधिकार ही मानवाधिकार हैं—यह सत्य एक बार और सदैव के लिए स्वीकार किया जाना चाहिए।”


