प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षकों के तबादले को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी शिक्षक को तबादले का कोई अंतर्निहित या स्वतः मिलने वाला कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है। शिक्षकों के तबादले से जुड़े अधिकार संबंधित तबादला नीति और सेवा नियमों के आधार पर ही तय होंगे। यह फैसला न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की पीठ ने सुनाया।
अदालत ने बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों के अंतरजनपदीय तबादले से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकार की ओर से तैयार की गई जिला-वार विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात सूची का बच्चों के निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम से सीधे तौर पर कोई संबंध नहीं है।
अदालत ने कहा कि निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम में शिक्षकों के अधिकारों की तुलना में उनके कर्तव्यों पर अधिक जोर दिया गया है। इसलिए इस अधिनियम के आधार पर शिक्षक तबादले का अपना स्वतंत्र अधिकार नहीं जता सकते।
फैसले में उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा शिक्षक पदस्थापन नियमावली, 2008 के नियम 8(2)(घ) का भी उल्लेख किया गया। इसके अनुसार सामान्य परिस्थितियों में नियुक्ति या पदस्थापन के पांच वर्ष के भीतर अंतरजनपदीय तबादले के आवेदन पर विचार नहीं किया जाता। हालांकि विशेष परिस्थितियों में महिला शिक्षकों को पति या ससुराल वाले जिले में तबादले की सुविधा दिए जाने का प्रावधान है।
अदालत ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा शिक्षक सेवा नियमावली, 1981 के नियम 21 का भी उल्लेख किया, जिसके तहत सक्षम अनुमति के बिना तबादले पर रोक का प्रावधान है। हाईकोर्ट के इस फैसले से अंतरजनपदीय तबादले की मांग कर रहे शिक्षकों की स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो गई है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि शिक्षकों की सेवा शर्तें निर्धारित नियमों और सरकार की प्रभावी नीति के अनुसार ही संचालित होंगी। केवल किसी कानून या अधिनियम का हवाला देकर शिक्षक तबादले को अपना मौलिक या स्वतः प्राप्त अधिकार नहीं बता सकते।


