29.9 C
Lucknow
Sunday, August 9, 2026

जाति और धर्म नहीं, राष्ट्र सर्वोपरि

Must read

(डॉ. सुधाकर आशावादी -विनायक फीचर्स)
संसार परिवर्तनशील हैं। कुछ सार्वभौमिक सत्यों को छोड़ दें, तो समाज को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार गतिशील रहना पड़ता है। जिस प्रकार एक ही स्थान पर बरसों से जमा पानी शुद्ध नहीं रहता, उसी प्रकार से बरसों तक एक ही प्रकार की लीक निभाते रहने से समाज का विकास संभव नहीं है। यही कारण है कि समय समय पर सामाजिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव हुए तथा विश्व पटल पर मनुष्य ने अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराई। वस्तुस्थिति यह है कि यदि आदिम युग की व्यवस्था में ही व्यक्ति अपना अस्तित्व बनाए रखता, तो समाज आधुनिक संसाधनों के प्रयोग तक कभी नहीं पहुंच पाता, न ही जीवनयापन को सरल बनाने के लिए नई नई सुविधाओं का सुख भोग पाता।
कहने का आशय यही है कि समय समय पर हुए आविष्कारों ने व्यक्ति की जीवन चर्या को सरल बनाने में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन किया है। विडंबना यह भी है कि समाज में आए बदलावों को कतिपय मुट्ठी भर लोगों का समर्थन नहीं मिला, जिस कारण समाज में स्वामी एवं दास जैसे कुछ प्रसंग सामने आए। अस्तित्व रक्षा हेतु कमजोरों को सदैव संघर्ष करना पड़ा। कुछेक परिवारों ने अपनी आर्थिक समृद्धि को अपनी खानदानी बपौती मानकर सामंतवादी आचरण को प्रमुखता दी, जिसका खामियाजा आज भी देश को भुगतना पड़ रहा है। सामंतवाद एवं दासत्व कुछ व्यक्तियों की मानसिकता में इतना घर कर गया, कि उन्होंने इस मानसिकता को ओढ़ कर इसी में जीने मरने को अपनी नियति मान लिया तथा इसी व्यवस्था में अपनी आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करने लगे। सामंतवादी मानसिकता से जुड़े लोगों ने इसका नुकसान भी उठाया। सामान्य वर्ग में शामिल होने के कारण प्रत्येक प्रकार की सरकारी सुविधाओं से उन्हें वंचित होना पड़ा, दूसरी ओर दासत्व को ओढ़ कर राजनीति का हथियार बनाया गया। दासत्व बोध को विभिन्न जातियों में बाँट कर जातियों के ठेकेदारों ने अपना अपना राजनीतिक कद बढ़ाकर अपने अपने स्वार्थ पूरे किए। उन्हें सामान्य वर्ग के विरुद्ध भड़का कर कभी भी पुरुषार्थ करने के लिए प्रेरित नहीं किया। जाति आधारित सुविधाओं के क्षणिक सपने दिखाकर उनकी सोचने समझने की क्षमता को ही समाप्त करने का षड्यंत्र रचा गया ताकि कुछ जातियाँ सामाजिक सद्भाव और सामाजिक संरचना में अपना योगदान देने से परहेज़ करें, समाज के प्रति अपने दायित्व से विमुख होकर वे केवल अधिकारों के लिए ही संघर्ष करें।
यही स्थिति देश के रचनात्मक एवं सकारात्मक विकास में बाधक है। जातिवादी संकीर्ण मानसिकता एवं जातिवादी प्रतिनिधियों की अलगाववादी सोच के चलते देश में ऐसे राजनीतिक तत्वों की भरमार हो गई है, जो मानवीय संवेदनाओं को रौंदकर देश को अराजकता की दलदल में धकेलने हेतु आतुर रहते हैं तथा भीड़ को उकसाकर देश की एकता व अखंडता को छिन्न भिन्न करना चाहते हैं। सो आवश्यक है कि दलगत राजनीतिक भावना से उबरकर निरपेक्ष भाव से विचारक एकजुट हों तथा देश, काल और परिस्थितियों अनुरूप राष्ट्र की प्रगति हेतु व्यापक चिंतन करके ऐसा विमर्श तैयार करें, जिसमें राष्ट्र सर्वोपरि की भावना प्रमुख हो तथा जाति और धर्म के विमर्श द्वितीय हों। (विनायक फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article