
शरद कटियार
सरकारी सेवा में निलंबन का उद्देश्य कर्मचारी को दंडित करना नहीं, बल्कि विभागीय जांच को निष्पक्ष और प्रभावी बनाना होता है। इसी कारण सेवा नियमों के अनुसार निलंबित कर्मचारी से सामान्यतः कार्यालय का नियमित कार्य नहीं लिया जाता और उसे केवल विभागीय जांच या आवश्यक कार्यवाही के लिए ही बुलाया जाता है।
केंद्रीय सेवा नियमों के अंतर्गत जारी निर्देशों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि निलंबन का सहारा प्रायः उन परिस्थितियों में लिया जाता है, जहाँ कर्मचारी का कार्यालय में बने रहना जांच, दस्तावेज़ों या गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
यदि किसी कर्मचारी को निलंबित करने के बाद भी प्रतिदिन उसी कार्यालय में बुलाया जाए, तो यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब निलंबन का उद्देश्य ही उसे नियमित कार्यस्थल से अलग रखना है, तब प्रतिदिन कार्यालय में उसकी उपस्थिति क्यों आवश्यक है?
ऐसी स्थिति में दो गंभीर प्रश्न सामने आते हैं। पहला, यदि आरोप कार्यालय के अभिलेखों, वित्तीय अनियमितताओं या प्रशासनिक कार्यों से जुड़े हैं, तो कार्यालय में नियमित उपस्थिति जांच की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा सकती है। दूसरा, इससे दस्तावेज़ों, अभिलेखों अथवा संभावित गवाहों के प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न हो सकती है। यही कारण है कि निलंबन का उद्देश्य ऐसे जोखिमों को कम करना भी माना जाता है।
हालांकि कानून यह भी कहता है कि यदि विभागीय जांच अधिकारी को कर्मचारी का बयान लेना हो, दस्तावेज़ों का सत्यापन कराना हो या किसी विशेष जांच प्रक्रिया में उसकी उपस्थिति आवश्यक हो, तो उसे बुलाया जा सकता है। लेकिन यह आवश्यकता-आधारित होना चाहिए, न कि नियमित कार्यालय उपस्थिति के रूप में।
यदि बिना किसी स्पष्ट जांच संबंधी कारण के निलंबित कर्मचारी को प्रतिदिन कार्यालय आने का निर्देश दिया जाता है, तो कर्मचारी यह आपत्ति उठा सकता है कि ऐसा आदेश निलंबन के उद्देश्य के अनुरूप नहीं है और उससे अनावश्यक मानसिक एवं प्रशासनिक दबाव उत्पन्न हो रहा है। ऐसे मामलों में आदेश की वैधता उसके तथ्यों, लागू सेवा नियमों और सक्षम प्राधिकारी द्वारा दर्ज कारणों पर निर्भर करेगी।
उत्तर प्रदेश में भी निलंबन संबंधी प्रावधानों का मूल उद्देश्य विभागीय जांच को निष्पक्ष बनाए रखना है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भी यह रेखांकित किया है कि निलंबन एक अंतरिम प्रशासनिक उपाय है, दंड नहीं।
निलंबित कर्मचारी को केवल विभागीय जांच, बयान, दस्तावेज़ों के सत्यापन या अन्य आवश्यक कार्यवाही के लिए ही बुलाया जाना चाहिए। यदि उसे प्रतिदिन कार्यालय बुलाया जाता है, तो प्रशासन के पास उसका स्पष्ट कानूनी और प्रशासनिक औचित्य होना चाहिए। अन्यथा ऐसा आदेश निलंबन की मूल भावना के विपरीत होने के आधार पर विवाद का विषय बन सकता है और कर्मचारी सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के समक्ष इसे चुनौती दे सकता है।


