(डॉ. दीपक गोस्वामी -विनायक फीचर्स)
108 केवल एक संख्या नहीं है। यह ब्रह्मांड की धड़कन है। यह वह सूत्र है जो लौकिक और परालौकिक जगत को एक माला के धागे में पिरो देता है। ऋषियों ने इसे यूँ ही नहीं चुना। 108 में सृष्टि का पूरा गणित, विज्ञान और अध्यात्म एक साथ बसता है।
वैदिक ऋषि खगोल के सबसे बड़े विद्यार्थी थे। उन्होंने देखा कि सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास से 108 गुना है। सूर्य और पृथ्वी के बीच की औसत दूरी भी सूर्य के व्यास की 108 गुना है। ठीक इसी तरह चंद्रमा और पृथ्वी की दूरी, चंद्रमा के व्यास की 108 गुना है। धरती, सूरज और चाँद का यह संतुलन 108 के अनुपात पर टिका है।
जब हम 108 बार मंत्र जपते हैं तो हम अनजाने में इसी ब्रह्मांडीय लय से जुड़ जाते हैं। हम अपने शरीर की लय को ब्रह्मांड की लय में मिला देते हैं।
उपनिषद कहते हैं कि मानव शरीर में 108 प्रमुख नाड़ियाँ हैं जो हृदय चक्र से निकलकर पूरे शरीर में प्राण का संचार करती हैं। इनमें सुषुम्ना सबसे महत्वपूर्ण है।
जब आप माला के 108 मनके फेरते हैं, तो आप एक-एक नाड़ी पर मंत्र की ऊर्जा पहुंचाते हैं। हर मनके के साथ एक विकार धुलता है, एक ग्रंथि खुलती है इसीलिए 108 की माला आत्मशोधन का सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक यंत्र है।
सांख्य दर्शन 108 को पूर्णता मानता है। 9 ग्रह और 12 राशियाँ मिलकर 108 बनती हैं। 9 पूर्णता का अंक है और 12 कालचक्र का। 9 की विशेषता यह है कि इसे किसी से भी गुणा करो, अंकों का योग 9 ही रहेगा। यह अविनाशी का प्रतीक है।
108 में 1 ब्रह्म है, 0 शून्यता या पूर्णता है, और 8 अनंत का चिह्न है। एक से शून्य होते हुए अनंत तक की यात्रा ही तो अध्यात्म है।
धर्मग्रंथ 108 से भरे हैं। श्रीमद्भागवत में 108 गोपियाँ, शिव के 108 नाम, विष्णु के 108 नाम, देवी के 108 नाम। बौद्ध धर्म में 108 प्रकार के क्लेश और जैन धर्म में अरिहंत के 108 गुण। महाभारत के 18 पर्व, गीता के 18 अध्याय – 18 का 6 गुना 108। यह संख्या किसी एक सम्प्रदाय की नहीं, यह सार्वभौम है।
तांत्रिक दृष्टि से श्री यंत्र में 54 संस्कृत वर्ण हैं। प्रत्येक वर्ण के स्त्री और पुरुष रूप मिलकर 108 होते हैं। शिव-शक्ति के इन्हीं 108 संयोगों से सृष्टि चलती है। माला का हर मनका इसी संयोग को जागृत करता है।
सामाजिक रूप से 108 हमें समता सिखाता है। माला के सभी मनके बराबर होते हैं। केवल सुमेरु अलग होता है, पर वह अहंकार नहीं करता। वह बस दिशा देता है। समाज भी तभी सुंदर है जब सब समान हों और नेतृत्व सेवा करे इसीलिए माला पूरी होने पर उसे उल्टा नहीं फेरते, गुरु को नमन कर फिर शुरू करते हैं।
आर्थिक और राजनीतिक जीवन में 108 संतुलन का पाठ है। 1 इकाई, 0 निरहंकार, 8 अष्टलक्ष्मी। जब व्यक्ति अहंकार छोड़कर चलता है तभी सच्ची समृद्धि आती है। राष्ट्र निर्माण भी 108 छोटे-छोटे धैर्यपूर्ण कदमों से होता है, एक बड़ी छलांग से नहीं।
आधुनिक विज्ञान कहता है कि हृदय से निकलने वाला विद्युत-चुम्बकीय क्षेत्र मस्तिष्क से 108 गुना शक्तिशाली होता है। जब हम जप करते हैं तो हृदय का यह क्षेत्र विस्तृत होता है।
भाषा के स्तर पर भी 108 अद्भुत है। संस्कृत में 54 अक्षर हैं। शिव और शक्ति रूप में ये 108 हो जाते हैं। हम जो कुछ भी बोलते हैं वह इन्हीं 108 ध्वनियों के संयोजन से बनता है। 108 बार जप का अर्थ है अपनी पूरी वाणी को शुद्ध कर लेना।
जब हम 108 बार “ॐ”, “राम” या “सोऽहम्” जपते हैं तो हम केवल गिनती नहीं कर रहे होते। तब हम 27 नक्षत्रों के 4-4 चरण, कुल 108 चरणों को पार कर रहे होते हैं। काल को जीत रहे होते हैं। अपने भीतर सोए 108 देवत्व को जगा रहे होते हैं।
व्याकुल हो तो 108 गहरी साँसें लो। क्रोध आए तो 108 तक गिनो। निराशा घेरे तो 108 बार कहो “मैं अनंत हूँ”। देखना, भीतर प्रकाश भर जाएगा। 108 अंधविश्वास नहीं है। यह चेतना का गणित है। यह वह सेतु है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म, तर्क और श्रद्धा एक हो जाते हैं।
आज उठो, माला उठाओ,108 मनकों पर अपने 108 भय, 108 विकार अर्पित कर दो। जब अंतिम मनका पूरा होगा, तब पाओगे कि तुम स्वयं पूर्ण हो गए। तुम ही शुभ हो, तुम ही मंगल हो, तुम ही 108 हो। यह पुष्पांजलि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण के लिए है। जो इसे धारण करेगा, उसका जीवन रस, प्रकाश और प्रेम से भर जाएगा। ,*(विनायक फीचर्स)*


