डॉ विजय गर्ग
कृत्रिम बुद्धिमत्ता आज दुनिया की अर्थव्यवस्था, उद्योगों और कार्य संस्कृति को अभूतपूर्व गति से बदल रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि, बैंकिंग, विनिर्माण और परिवहन जैसे लगभग हर क्षेत्र में एआई नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। भारत भी एआई क्रांति के अग्रणी देशों में शामिल होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस प्रगति के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा है—क्या एआई का लाभ भारत की उन करोड़ों महिला श्रमिकों तक भी पहुँचेगा, जो असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं और जिनका योगदान अक्सर अदृश्य बना रहता है?
भारत की लगभग 90 प्रतिशत कार्यशील आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। इनमें बड़ी संख्या महिलाओं की है, जो घरेलू कामगार, खेतिहर मजदूर, सड़क विक्रेता, घर-आधारित कारीगर, परिधान उद्योग से जुड़ी श्रमिक, कूड़ा बीनने वाली, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, देखभाल सेवाएँ प्रदान करने वाली और छोटे स्तर की उद्यमी के रूप में कार्य करती हैं। ये महिलाएँ देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं, लेकिन उनका श्रम अक्सर सरकारी आँकड़ों, आर्थिक योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में पर्याप्त स्थान नहीं पाता।
इन्हें “अदृश्य महिला श्रमिक” इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका काम दिखाई तो देता है, लेकिन उसका उचित मूल्यांकन नहीं होता। कम आय, अस्थायी रोजगार, सीमित शिक्षा, डिजिटल संसाधनों की कमी और वित्तीय सेवाओं तक सीमित पहुँच उनके सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। यदि एआई का विकास केवल संगठित क्षेत्रों तक सीमित रह गया, तो यह डिजिटल असमानता और सामाजिक विषमता को और बढ़ा सकता है।
हालाँकि, यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएँ, तो एआई इन महिलाओं के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है। कृषि क्षेत्र में एआई आधारित मौसम पूर्वानुमान, कीट पहचान प्रणाली और बाजार मूल्य संबंधी जानकारी महिला किसानों को बेहतर निर्णय लेने में सहायता कर सकती है। घर-आधारित कारीगर एआई समर्थित डिज़ाइन टूल, भाषा अनुवाद और ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म की मदद से अपने उत्पाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचा सकती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं में भी एआई बड़ी भूमिका निभा सकती है। मोबाइल आधारित एआई एप्लिकेशन गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य परामर्श, टीकाकरण संबंधी जानकारी, पोषण संबंधी सुझाव और टेलीमेडिसिन सेवाएँ उपलब्ध करा सकते हैं। इससे दूरदराज़ क्षेत्रों की महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच मिल सकती है।
वित्तीय समावेशन के क्षेत्र में भी एआई महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। अनेक असंगठित महिला श्रमिकों के पास बैंक ऋण, बीमा और औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच नहीं होती। एआई आधारित वैकल्पिक क्रेडिट मूल्यांकन प्रणाली उन्हें सूक्ष्म ऋण, बीमा और डिजिटल बैंकिंग सुविधाओं से जोड़ सकती है। स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध वॉयस-आधारित एआई सेवाएँ वित्तीय साक्षरता को भी बढ़ावा दे सकती हैं।
शिक्षा और कौशल विकास एआई के समावेशी उपयोग की सबसे बड़ी कुंजी हैं। अनेक महिलाओं के पास डिजिटल साक्षरता का अभाव है। एआई आधारित शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म स्थानीय भाषाओं, व्यक्तिगत सीखने की गति और वॉयस इंटरफ़ेस के माध्यम से उन्हें नए कौशल सीखने का अवसर दे सकते हैं। इससे वे बदलती अर्थव्यवस्था में नए रोजगार और उद्यमिता के अवसरों का लाभ उठा सकेंगी।
लेकिन एआई केवल अवसर ही नहीं, कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी लेकर आती है। स्वचालन (Automation) के कारण कई पारंपरिक नौकरियों की मांग कम हो सकती है। यदि एआई प्रणालियाँ पक्षपातपूर्ण आँकड़ों पर आधारित हों, तो वे लैंगिक और सामाजिक भेदभाव को और बढ़ा सकती हैं। जिन महिलाओं के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट या डिजिटल कौशल नहीं हैं, वे एआई आधारित सेवाओं से वंचित रह सकती हैं।
इसलिए सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में डिजिटल अवसंरचना को मजबूत करें, सस्ता इंटरनेट उपलब्ध कराएँ और महिलाओं के लिए विशेष एआई एवं डिजिटल कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करें। तकनीकी कंपनियों को भी ऐसे एआई समाधान विकसित करने चाहिए जो स्थानीय भाषाओं, कम शिक्षित उपयोगकर्ताओं और ग्रामीण परिस्थितियों के अनुकूल हों।
महिला स्वयं सहायता समूह, गैर-सरकारी संगठन और सामुदायिक संस्थाएँ भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। वे महिलाओं को डिजिटल प्रशिक्षण देकर, जागरूकता फैलाकर और तकनीक तक पहुँच बढ़ाकर एआई को वास्तव में जन-हितैषी बना सकती हैं। जब महिलाएँ केवल तकनीक की उपभोक्ता नहीं बल्कि उसके विकास और उपयोग की भागीदार बनेंगी, तभी एआई का वास्तविक लाभ समाज तक पहुँचेगा।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी ही नहीं, बल्कि वे करोड़ों मेहनतकश महिलाएँ भी हैं जो खेतों, घरों, कारखानों, बाजारों और छोटे-छोटे उद्यमों के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती हैं। इन्हें एआई से जोड़ना केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की भी आवश्यकता है। यदि भारत अपनी अदृश्य महिला श्रमिकों को तकनीक से सशक्त बना देता है, तो उसकी एआई क्रांति वास्तव में समावेशी और विश्व के लिए एक आदर्श बन सकती है।
एआई की सफलता का आकलन केवल अत्याधुनिक तकनीकों, बड़े निवेशों या नए स्टार्टअप्स की संख्या से नहीं किया जाना चाहिए। इसकी वास्तविक सफलता तब होगी जब गाँव की एक महिला किसान, शहर की एक घरेलू कामगार, एक सड़क विक्रेता या घर में हस्तशिल्प बनाने वाली महिला भी एआई की मदद से अपनी आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार कर सके।
भारत का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल कुछ लोगों की सुविधा का साधन न रहकर, समाज के सबसे उपेक्षित और अदृश्य वर्गों तक भी समान रूप से पहुँचे। भारत की एआई क्रांति का सबसे बड़ा लक्ष्य यही होना चाहिए कि कोई भी महिला पीछे न छूटे।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


