डॉ विजय गर्ग
हर पीढ़ी अपने समय की परिस्थितियों, अवसरों और चुनौतियों के अनुरूप अपने सपने गढ़ती है। एक समय था जब अधिकांश युवाओं का सपना भारतीय सेना, नौसेना या वायुसेना में भर्ती होकर देश की सेवा करना होता था। वर्दी केवल एक नौकरी का प्रतीक नहीं थी, बल्कि सम्मान, अनुशासन, साहस और राष्ट्रभक्ति की पहचान मानी जाती थी। परिवारों के लिए यह गर्व का विषय होता था कि उनका बेटा या बेटी देश की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित करे। आज समय बदल चुका है। तकनीक और डिजिटल क्रांति ने युवाओं की सोच, जीवनशैली और करियर की प्राथमिकताओं को एक नया रूप दे दिया है।
आज के बच्चों और युवाओं के हाथों में किताबों के साथ-साथ स्मार्टफोन भी है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उन्हें पूरी दुनिया से जोड़ दिया है। अब ज्ञान, मनोरंजन, व्यवसाय और अभिव्यक्ति के अनगिनत अवसर उपलब्ध हैं। लेकिन इसी के साथ एक नई प्रवृत्ति भी विकसित हुई है, जिसमें त्वरित प्रसिद्धि, वायरल वीडियो, लाइक्स और फॉलोअर्स को सफलता का पैमाना मान लिया गया है। कई युवाओं के लिए आज कंटेंट क्रिएटर या इन्फ्लुएंसर बनना उतना ही आकर्षक है जितना कभी सेना में अधिकारी बनने का सपना हुआ करता था।
हालाँकि यह कहना बिल्कुल उचित नहीं होगा कि आज के युवाओं में देशभक्ति की भावना कम हो गई है। आज भी हजारों युवा भारतीय सशस्त्र बलों में भर्ती होने के लिए कठिन प्रशिक्षण लेते हैं और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन उनके सामने करियर के विकल्प पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं। सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा साइंस, डिजिटल मार्केटिंग, स्टार्टअप, ई-कॉमर्स और रचनात्मक उद्योगों ने नई संभावनाओं के द्वार खोल दिए हैं। इसलिए युवाओं की प्राथमिकताएँ भी स्वाभाविक रूप से बदली हैं।
सोशल मीडिया स्वयं कोई समस्या नहीं है। यह एक शक्तिशाली माध्यम है, जो सीखने, संवाद करने, अपने विचार व्यक्त करने और प्रतिभा को दुनिया तक पहुँचाने का अवसर देता है। समस्या तब पैदा होती है जब इसका अत्यधिक उपयोग समय की बर्बादी, दिखावे की संस्कृति और आभासी लोकप्रियता की दौड़ में बदल जाता है। यदि युवा घंटों रील्स देखने या बनाने में बिताएँ और पढ़ाई, खेल, स्वास्थ्य तथा सामाजिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा करें, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।
इस स्थिति के लिए केवल युवाओं को दोष देना भी उचित नहीं है। परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार सभी की साझा जिम्मेदारी है कि वे बच्चों को संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा दें। उन्हें यह समझाना आवश्यक है कि वास्तविक सफलता केवल प्रसिद्धि या फॉलोअर्स की संख्या से नहीं, बल्कि ज्ञान, चरित्र, परिश्रम और समाज के प्रति योगदान से मापी जाती है।
विद्यालयों में सेना, विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा, खेल, अनुसंधान और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों से जुड़े प्रेरणादायक व्यक्तित्वों के साथ संवाद आयोजित किए जाने चाहिए। पूर्व सैनिकों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, डॉक्टरों और समाजसेवियों के अनुभव विद्यार्थियों को वास्तविक जीवन के आदर्शों से परिचित करा सकते हैं। साथ ही, डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही आवश्यक है, ताकि बच्चे तकनीक का उपयोग रचनात्मक कार्यों और सीखने के लिए करें, न कि केवल मनोरंजन के लिए।
हर युग की अपनी विशेषताएँ होती हैं। पुरानी पीढ़ी अनुशासन, धैर्य और राष्ट्रसेवा की भावना के लिए जानी जाती थी, जबकि नई पीढ़ी तकनीकी दक्षता, नवाचार और वैश्विक सोच के लिए पहचानी जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों पीढ़ियाँ एक-दूसरे से सीखें। यदि पुरानी पीढ़ी अपने अनुभव साझा करे और नई पीढ़ी अपनी तकनीकी क्षमता का सकारात्मक उपयोग करे, तो समाज कहीं अधिक मजबूत बन सकता है।
अंततः उद्देश्य न तो सोशल मीडिया की आलोचना करना है और न ही केवल पुराने समय का गुणगान करना। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक और नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। यदि युवाओं में अनुशासन, देशप्रेम, संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और सेवा की भावना के साथ आधुनिक कौशल भी विकसित किए जाएँ, तो वे चाहे सेना में जाएँ, वैज्ञानिक बनें, शिक्षक बनें, उद्यमी बनें या डिजिटल क्रिएटर—वे राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भविष्य उसी पीढ़ी का होगा जो तकनीक का उपयोग केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान, नवाचार और समाज की भलाई के लिए करेगी। यही संतुलन नई पीढ़ी को वास्तविक सफलता और देश को सशक्त भविष्य प्रदान करेगा।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


