– डॉ. हीरा लाल
हर वर्ष 28 जुलाई को पूरी दुनिया विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस मनाती है। यह दिन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता को चेतावनी देने वाला अवसर है। प्रकृति ने हमें जीवन के लिए आवश्यक हर संसाधन दिया है,शुद्ध हवा, स्वच्छ जल, उपजाऊ भूमि, घने वन, नदियां, पर्वत और जैव विविधता। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में इन्हीं प्राकृतिक संसाधनों का सबसे अधिक दोहन किया गया है। आज स्थिति यह है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान, जंगलों का लगातार खत्म होना, नदियों का प्रदूषण और जैव विविधता का संकट पूरी दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं।
भारत जैसे देश, जहां प्रकृति और संस्कृति का गहरा संबंध रहा है, वहां भी पर्यावरणीय संकट लगातार गहराता जा रहा है। कभी साफ और निर्मल बहने वाली नदियां आज प्रदूषण की मार झेल रही हैं। शहरों का विस्तार खेती की जमीन और जंगलों को निगल रहा है। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। हर साल गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं और मानसून का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। कहीं अत्यधिक बारिश से बाढ़ आती है तो कहीं सूखे की स्थिति बन जाती है। यह सब प्रकृति के साथ लगातार हो रहे असंतुलित व्यवहार का परिणाम है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया भर में लाखों प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद लगातार बढ़ा है और यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में समुद्र का जलस्तर बढ़ने, खाद्य संकट, जल संकट और भीषण प्राकृतिक आपदाओं का खतरा और गंभीर हो जाएगा। भारत भी उन देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सबसे अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
प्रकृति संरक्षण का अर्थ केवल पेड़ लगाना नहीं है। यह हमारी जीवनशैली में बदलाव लाने का संकल्प भी है। जल की एक-एक बूंद बचाना, बिजली की अनावश्यक खपत रोकना, प्लास्टिक का उपयोग कम करना, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, नदियों और तालाबों को स्वच्छ रखना तथा जैविक खेती को अपनाना भी प्रकृति संरक्षण का ही हिस्सा है। यदि हर नागरिक अपने स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास करे तो उसका प्रभाव पूरे समाज पर दिखाई देगा।
सरकारें भी पर्यावरण संरक्षण के लिए अनेक योजनाएं चला रही हैं। बड़े पैमाने पर पौधरोपण अभियान, नदी संरक्षण परियोजनाएं, वन क्षेत्र बढ़ाने की योजनाएं, सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा, प्लास्टिक पर नियंत्रण तथा स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। लेकिन केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज, उद्योग, शैक्षणिक संस्थान और आम नागरिक इसमें भागीदारी नहीं करेंगे, तब तक पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य अधूरा रहेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। ऐसी विकास योजनाएं बनाई जाएं जो प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए बिना आर्थिक प्रगति सुनिश्चित करें। आने वाली पीढ़ियों को केवल आधुनिक शहर ही नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, निर्मल नदियां, हरे-भरे जंगल और सुरक्षित जैव विविधता भी विरासत में मिलनी चाहिए।
विश्व प्रकृति संरक्षण दिवस हमें यह संदेश देता है कि पृथ्वी हमारे पूर्वजों की संपत्ति नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। यदि आज हमने प्रकृति को बचाने का संकल्प नहीं लिया, तो कल मानव जीवन भी गंभीर संकट में पड़ सकता है। इसलिए यह समय केवल चिंता व्यक्त करने का नहीं, बल्कि ठोस कदम उठाने का है। हर लगाया गया पौधा, बचाई गई हर बूंद पानी और पर्यावरण के लिए किया गया हर छोटा प्रयास भविष्य की सुरक्षित और हरित दुनिया की नींव बनेगा।
प्रकृति का सम्मान ही मानवता का सम्मान है। पृथ्वी बचेगी, तभी भविष्य बचेगा।
लेखक यूपी सरकार मे वरिष्ठ आईएएस अधिकारी हैं।


