– शरद कटियार
देश में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (एथेनॉल ब्लेंडिंग) को लेकर पिछले कुछ वर्षों से लगातार चर्चा होती रही है। सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताती रही है। वहीं, वाहन मालिकों और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के विशेषज्ञ समय-समय पर इसके तकनीकी प्रभाव, ईंधन दक्षता और वाहनों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे माहौल में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का यह बयान कि “पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से मेरा कोई लेना-देना नहीं है” नई बहस को जन्म देता है।
नितिन गडकरी ने स्पष्ट किया कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से जुड़ी नीति और उसका क्रियान्वयन उनके मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। यह बयान प्रशासनिक दृष्टि से भले ही सही हो, लेकिन आम जनता के लिए यह समझना आसान नहीं होता कि सरकार की कौन-सी नीति किस मंत्रालय के अधीन है। जनता के सामने अक्सर पूरी सरकार एक इकाई के रूप में दिखाई देती है, इसलिए जब किसी बड़े फैसले पर अलग-अलग मंत्रालयों की जिम्मेदारियां सामने आती हैं, तो भ्रम की स्थिति भी पैदा होती है।
भारत सरकार पिछले कई वर्षों से पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की नीति पर काम कर रही है। इसके पीछे प्रमुख उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा की बचत करना, गन्ना किसानों और डिस्टिलरी उद्योग को नया बाजार उपलब्ध कराना तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना है। इस नीति को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।
हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया के साथ कई व्यावहारिक सवाल भी जुड़े हैं। दोपहिया और चारपहिया वाहन मालिकों के मन में यह जिज्ञासा बनी रहती है कि अधिक एथेनॉल मिश्रित ईंधन का पुराने इंजनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? माइलेज में कितना अंतर आएगा? वाहन निर्माता कंपनियों की क्या तैयारी है? और यदि किसी तकनीकी समस्या का सामना करना पड़े तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? इन प्रश्नों के स्पष्ट और एकरूप उत्तर अभी भी आम लोगों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाए हैं।
यही कारण है कि जब इस विषय पर सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री का बयान आता है तो वह केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नीतिगत महत्व भी रखता है। गडकरी का यह कहना कि एथेनॉल ब्लेंडिंग उनके मंत्रालय का विषय नहीं है, प्रशासनिक जिम्मेदारियों की सीमाओं को स्पष्ट करता है। लेकिन इसके साथ यह भी आवश्यक है कि संबंधित मंत्रालय जनता के बीच जाकर इस नीति के लाभ, चुनौतियों और वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में समझाएं, ताकि किसी प्रकार की भ्रांति न रहे।
भारत जैसे विशाल देश में ऊर्जा की बढ़ती मांग को देखते हुए वैकल्पिक ईंधनों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। एथेनॉल, बायोफ्यूल, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे विकल्प भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का हिस्सा बनने जा रहे हैं। लेकिन किसी भी नई नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य पर नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता, प्रभावी संवाद और जनता के विश्वास पर भी निर्भर करती है।
एथेनॉल मिश्रण की नीति का मूल्यांकन राजनीतिक बयानबाजी के बजाय वैज्ञानिक तथ्यों, आर्थिक लाभ और पर्यावरणीय प्रभावों के आधार पर होना चाहिए। यदि यह नीति किसानों की आय बढ़ाती है, आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाती है और प्रदूषण कम करने में मददगार साबित होती है, तो निश्चित रूप से यह देश के हित में है। वहीं यदि इसके क्रियान्वयन में कोई तकनीकी या व्यावहारिक कठिनाई सामने आती है, तो सरकार को उसका समाधान भी उतनी ही गंभीरता से प्रस्तुत करना होगा।
नितिन गडकरी का ताजा बयान एक बार फिर यह याद दिलाता है कि किसी भी राष्ट्रीय नीति में स्पष्ट जवाबदेही, मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय और जनता के साथ प्रभावी संवाद उतना ही आवश्यक है, जितना स्वयं नीति का उद्देश्य। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास तभी मजबूत होता है जब नीति के साथ-साथ उसकी जिम्मेदारी भी पूरी पारदर्शिता से सामने आए।


