(मनोज कुमार अग्रवाल-विनायक फीचर्स)
दीक्षा के बिना शिक्षा का कोई मूल्य नहीं होता। जब तक संस्कार और नैतिकता की वैचारिकी न रोपी जाए तब तक कथित शिक्षित मूर्खों की पैदावार होती रहेगी। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में हुए छात्र आंदोलन के दौरान सामने आए कुछ वीडियो और दृश्य इसी आशंका को बल देते हैं।
सामाजिक लोकलाज को किनारे रखकर कुछ युवाओं द्वारा सार्वजनिक मंच से जिस तरह की अभद्र, आपत्तिजनक और अश्लील नारेबाजी की गई, वह केवल एक आंदोलन की शैली का सवाल नहीं है। यह हमारे सार्वजनिक जीवन, भाषा और विमर्श के गिरते स्तर का संकेत है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में प्रधानमंत्री और विदेशी नेताओं को लेकर अमर्यादित टिप्पणियां, जातिसूचक शब्द और ऐसे पोस्टर दिखे जो सार्वजनिक रूप से स्वीकार्य नहीं हैं। महिला पत्रकारों के साथ धक्का-मुक्की और उन पर पानी की बोतलें फेंकना भी सामने आया। आयोजकों का कहना है कि केवल चार नारे ही आधिकारिक थे और आंदोलन को बदनाम करने के लिए बाहरी असामाजिक तत्व घुस आए। पुलिस ने फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से निगरानी कर कई एफआईआर दर्ज की हैं। लेकिन सवाल बना रहता है कि भीड़ में ऐसे तत्व आए कैसे और उन्हें अभद्रता करने का साहस कहां से मिला?
किसी भी संविधान सम्मत व्यवस्था में हर नागरिक को विरोध का अधिकार है। लेकिन विरोध भाषा की हिंसा और अश्लीलता से मुक्त होना चाहिए। जब असहमति अपमान, गाली और व्यक्तिगत आक्षेप में बदल जाए तो वह विरोध नहीं, मानसिक दिवालियापन का परिचायक बन जाता है। तब लोकतांत्रिक संस्कृति ही कमजोर होती है। भारत के छात्र और युवा आंदोलनों का इतिहास तर्क, संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता का रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक असहमति मुखर रही पर मर्यादा बनी रही। आज सार्वजनिक जीवन में तू-तड़ाक और अशिष्ट भाषा को साहस मान लिया गया है और इसका असर सीधे नई पीढ़ी पर पड़ रहा है।
इस गिरावट के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण परिवार में संवाद की कमी है। एकल परिवार बढ़े हैं, माता-पिता काम में व्यस्त हैं और बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय कम हो गया है। अनुशासन, शिष्टाचार और व्यवहार की शिक्षा पीछे छूट गई है। दूसरा कारण शिक्षा व्यवस्था है। आज विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान और कौशल पर तो बल दिया जा रहा है, पर नागरिक उत्तरदायित्व, संवाद कौशल, संवैधानिक मूल्य, नैतिकता और सामाजिक कर्तव्य बोध अक्सर औपचारिकता बनकर रह गए हैं। यदि शिक्षा का लक्ष्य सिर्फ नौकरी है और सभ्य भाषा व लोकतांत्रिक संस्कार नहीं, तो उद्देश्य अधूरा है। भारतीय परंपरा का “विद्या ददाति विनयम्” आज फिर याद करने की जरूरत है।
तीसरा सबसे बड़ा कारण डिजिटल दुनिया है। ओटी, सोशल मीडिया, वेब सीरीज और स्टैंड-अप कॉमेडी में अभद्र भाषा का प्रयोग अब सामान्य हो गया है। एल्गोरिद्म भी विवाद और आक्रामक सामग्री को अधिक फैलाता है। ऐसे वातावरण में युवा यह मानने लगे हैं कि प्रभावशाली बनने के लिए आक्रामक भाषा आवश्यक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है। संविधान हमें बोलने की आजादी देता है, पर सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और दूसरों की गरिमा का सम्मान करने की भी अपेक्षा करता है। विरोध तब अधिक प्रभावी होता है जब वह तथ्यों, तर्कों और नैतिक बल पर आधारित हो।
इस समस्या का समाधान केवल कानूनों से नहीं निकलेगा। सबसे पहले परिवारों में संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। बच्चों के साथ समय बिताना, उनकी डिजिटल गतिविधियों में रुचि लेना और उन्हें भाषा तथा व्यवहार की मर्यादा सिखाना अभिभावकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों को भी संवाद कौशल, नागरिक शास्त्र, संवैधानिक मूल्यों और डिजिटल नागरिकता को शिक्षा का प्रभावी हिस्सा बनाना होगा। समाजशास्त्रियों और शिक्षाविदों को मिलकर उस जहर का तोड़ निकालना होगा जो एक समूची पीढ़ी में अनैतिकता, अशिष्टता और राष्ट्रीय दायित्व के प्रति उदासीनता पैदा कर रहा है।
जंतर-मंतर की घटना एक चेतावनी है। यदि समय रहते संस्कार, नैतिकता और कर्तव्य बोध को शिक्षा और परिवार का केंद्र नहीं बनाया गया तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर लेंगे जिसके पास डिग्री होगी पर दीक्षा नहीं। अधिकार होंगे पर कर्तव्य नहीं और ऐसा समाज ज्यादा दिन नहीं टिक सकता। (विनायक फीचर्स)


