प्रशांत कटियार
भारत एक कृषि प्रधान देश है और देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव आज भी किसानों के कंधों पर टिकी हुई है। हर मौसम में किसान अपनी मेहनत, समय और पूंजी लगाकर खेतों में फसल तैयार करता है, ताकि देश का अन्न भंडार भरा रहे। लेकिन जब खेती के सबसे महत्वपूर्ण संसाधनों में से एक—खाद (उर्वरक) की उपलब्धता समय पर नहीं होती, तो इसका सीधा असर खेती, किसान और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। खरीफ और रबी दोनों मौसम में खाद की किल्लत का मुद्दा अक्सर सामने आता है, जिससे किसानों की परेशानी कई गुना बढ़ जाती है।
धान, मक्का, गन्ना, आलू और दलहन जैसी फसलों के लिए समय पर डीएपी, यूरिया, एनपीके और अन्य उर्वरकों की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक होती है। बुआई और फसल की बढ़वार का समय सीमित होता है। यदि इस दौरान किसान को खाद नहीं मिलती, तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन दोनों प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि खाद की कमी केवल कृषि का विषय नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी प्रश्न है।
हर वर्ष खाद वितरण के समय अधिकांश जिलों में लंबी कतारें, सहकारी समितियों पर भीड़, कई-कई घंटे इंतजार और कई बार खाली हाथ लौटते किसानों की तस्वीरें सामने आती हैं। अनेक किसानों का आरोप रहता है कि सरकारी केंद्रों पर खाद उपलब्ध नहीं होती, जबकि कुछ निजी दुकानों पर अधिक कीमत पर वही खाद आसानी से मिल जाती है। यदि ऐसा होता है तो यह केवल आपूर्ति की समस्या नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
खाद की किल्लत के पीछे कई कारण हो सकते हैं। मांग और आपूर्ति में असंतुलन, परिवहन में देरी, समय पर रैक न पहुंचना, वितरण प्रणाली में खामियां, जमाखोरी और कालाबाजारी जैसी समस्याएं स्थिति को और गंभीर बना देती हैं। कई बार किसानों को एक बोरी खाद के साथ अनावश्यक उत्पाद खरीदने के लिए मजबूर किए जाने की शिकायतें भी सामने आती हैं। यदि यह सच है, तो यह किसानों के साथ अन्याय है और इस पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
सबसे अधिक परेशानी छोटे और सीमांत किसानों को होती है। बड़े किसान किसी तरह निजी बाजार से महंगी खाद खरीद लेते हैं, लेकिन सीमित संसाधनों वाले किसान कई दिनों तक सरकारी केंद्रों के चक्कर लगाने को मजबूर हो जाते हैं। इससे उनका समय, श्रम और आर्थिक संसाधन तीनों प्रभावित होते हैं। खेती पहले से ही मौसम की अनिश्चितताओं और बढ़ती लागत के दबाव में है। ऐसे में खाद की अनुपलब्धता किसानों की मुश्किलें और बढ़ा देती है।
सरकार हर वर्ष उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक व्यवस्था करती है। लाखों टन खाद राज्यों को आवंटित की जाती है और जिला स्तर पर निगरानी के निर्देश भी दिए जाते हैं। प्रशासन समय-समय पर निरीक्षण करता है और कालाबाजारी रोकने के लिए अभियान भी चलाता है। लेकिन यदि जमीनी स्तर पर किसान को समय पर खाद नहीं मिल रही है, तो इसका अर्थ है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है।
आवश्यकता इस बात की है कि खाद वितरण प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाया जाए। प्रत्येक जिले में खाद का वास्तविक स्टॉक सार्वजनिक पोर्टल और मोबाइल एप पर उपलब्ध हो, ताकि किसान यह जान सकें कि किस केंद्र पर कितनी खाद उपलब्ध है। ई-पॉइंट ऑफ सेल (e-POS) प्रणाली को और प्रभावी बनाया जाए तथा वितरण की वास्तविक समय में निगरानी हो। जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ त्वरित और कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
इसके साथ ही किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग के लिए भी जागरूक करना आवश्यक है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग, जैविक खाद, हरी खाद, वर्मी कम्पोस्ट और प्राकृतिक खेती जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। इससे रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता कम होगी और भूमि की उर्वरता भी लंबे समय तक बनी रहेगी।
कृषि विशेषज्ञों, सहकारी समितियों, प्रशासन और किसान संगठनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना भी जरूरी है। यदि किसी क्षेत्र में खाद की मांग बढ़ रही है, तो समय रहते अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए। संकट के समय केवल आश्वासन नहीं, बल्कि त्वरित और प्रभावी कार्रवाई किसानों का विश्वास मजबूत करती है।
देश का किसान किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि समय पर आवश्यक संसाधनों की अपेक्षा करता है। जब खेत में फसल लगाने का समय निकल जाता है, तब बाद में उपलब्ध कराई गई खाद भी उसका पूरा नुकसान नहीं भर सकती। इसलिए खाद की उपलब्धता को मौसमी समस्या मानकर टालना उचित नहीं होगा।
अन्नदाता की मजबूती ही देश की खाद्य सुरक्षा की गारंटी है। यदि किसान को समय पर खाद, बीज, सिंचाई और उचित मूल्य मिलेगा, तभी खेत लहलहाएंगे और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। खाद की किल्लत केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों की आजीविका और देश के भविष्य से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।


