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Saturday, July 25, 2026

युवाओं में बढ़ता नशा,भविष्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती

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अशोक भाटिया
किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा शक्ति होती है। यही युवा आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था, विज्ञान, शिक्षा, राजनीति और समाज की दिशा तय करते हैं। लेकिन जब यही युवा नशे की गिरफ्त में आने लगें, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए गंभीर चिंता का विषय बन जाती है। आज उत्तर प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों में नशे का बढ़ता जाल इस बात का संकेत है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में इसके दूरगामी और गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
एक समय था जब नशे की समस्या केवल महानगरों तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब यह छोटे शहरों, कस्बों और गांवों तक पहुंच चुकी है। शराब, गांजा और अफीम के साथ-साथ सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियां, इंजेक्शन और रासायनिक मादक पदार्थ तेजी से युवाओं के बीच अपनी जगह बना रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि नशे का कारोबार अब सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप और संगठित तस्करी नेटवर्क के जरिए भी फैल रहा है, जिससे इसकी पहुंच पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है।
नशा केवल शरीर को कमजोर नहीं करता, बल्कि सोचने-समझने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति और मानसिक संतुलन को भी प्रभावित करता है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने परिवार, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर होता चला जाता है। अनेक मामलों में चोरी, लूट, हिंसा, सड़क दुर्घटनाएं और घरेलू अपराधों के पीछे भी नशे की लत एक बड़ा कारण बनकर सामने आती है। इसलिए इसे केवल कानून-व्यवस्था का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा।
इसके पीछे कई सामाजिक कारण भी हैं। बेरोजगारी, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, मानसिक तनाव, असफलता का डर, गलत संगति, पारिवारिक संवाद की कमी और सोशल मीडिया पर दिखने वाली आभासी जीवनशैली युवाओं को मानसिक दबाव में डाल रही है। कई बार जिज्ञासा या दोस्तों के दबाव में शुरू हुआ नशा धीरे-धीरे लत में बदल जाता है और फिर उससे बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
पुलिस और नारकोटिक्स एजेंसियां लगातार मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ अभियान चला रही हैं। बड़ी मात्रा में ड्रग्स बरामद हो रही है और तस्करों की गिरफ्तारी भी हो रही है। यह आवश्यक है, लेकिन केवल पुलिस कार्रवाई से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। जब तक नशे की मांग समाप्त नहीं होगी, तब तक आपूर्ति का कोई न कोई रास्ता निकलता रहेगा।
इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिवार की है। माता-पिता को बच्चों के व्यवहार, मित्र मंडली और दिनचर्या पर संवेदनशील नजर रखनी होगी। केवल आर्थिक सुविधाएं देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बच्चों के साथ संवाद, विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव भी उतना ही आवश्यक है। कई बार समय पर की गई एक बातचीत किसी युवा को नशे की दुनिया में जाने से रोक सकती है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों को भी केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास और नशामुक्ति जागरूकता पर नियमित कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। प्रत्येक शिक्षण संस्थान में परामर्श व्यवस्था को मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, रोजगार, खेल सुविधाएं और रचनात्मक अवसर उपलब्ध कराना नशे के खिलाफ सबसे प्रभावी सामाजिक निवेश है। जब युवाओं के सामने सकारात्मक लक्ष्य होंगे, तो वे गलत रास्तों की ओर कम आकर्षित होंगे।
समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। नशे का शिकार हुआ प्रत्येक युवा अपराधी नहीं होता; कई बार वह परिस्थितियों का शिकार भी होता है। ऐसे युवाओं को तिरस्कार नहीं, बल्कि उपचार, परामर्श और पुनर्वास की आवश्यकता होती है। यदि समाज उन्हें दूसरा अवसर देगा, तो वे सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। यह जनसंख्या हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है, लेकिन यदि युवा नशे के दलदल में फंसते गए तो यही ताकत सबसे बड़ी चुनौती में बदल सकती है। इसलिए नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या सरकार की नहीं, बल्कि परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।
युवाओं को नशे से नहीं, शिक्षा से जोड़ना होगा; निराशा से नहीं, अवसरों से जोड़ना होगा; और अपराध से नहीं, आत्मविश्वास से जोड़ना होगा। क्योंकि एक नशामुक्त युवा ही एक मजबूत परिवार, सुरक्षित समाज और विकसित भारत की सबसे बड़ी पहचान है।

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