प्रो. एच. एन. शर्मा
“संसद केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारत के 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और उम्मीदों का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। यदि यही मंच लगातार गतिरोध का शिकार हो जाए, तो सबसे बड़ी क्षति लोकतंत्र और जनता दोनों की होती है।”
लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव संपन्न कराने से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि संसद के भीतर कितनी गंभीरता, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं। संसद वह स्थान है जहां सरकार जवाबदेह होती है, विपक्ष जनता की आवाज बनता है और देश के भविष्य से जुड़े कानूनों पर व्यापक चर्चा होती है। यही कारण है कि संसद को भारतीय लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में संसद के कई सत्र लगातार हंगामे, नारेबाजी और स्थगन की भेंट चढ़ते रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव ने कई बार महत्वपूर्ण विधायी कार्यों को प्रभावित किया है। परिणाम यह होता है कि जनता से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा अधूरी रह जाती है या फिर हो ही नहीं पाती।
लोकतंत्र में विपक्ष का मजबूत होना उतना ही आवश्यक है जितना सरकार का मजबूत होना। विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सरकार से कठिन सवाल पूछे, नीतियों की समीक्षा करे और जनता की समस्याओं को मजबूती से उठाए। दूसरी ओर सरकार की जिम्मेदारी केवल बहुमत के बल पर कानून पारित कराना नहीं, बल्कि विपक्ष की बात सुनना, जवाब देना और स्वस्थ संसदीय परंपराओं का सम्मान करना भी है। लोकतंत्र संवाद से चलता है, टकराव से नहीं।
आज देश के सामने अनेक गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं। महंगाई आम परिवारों की रसोई पर असर डाल रही है। बेरोजगारी युवाओं की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। किसानों की आय, शिक्षा व्यवस्था में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, साइबर अपराध, महिलाओं की सुरक्षा, सीमा सुरक्षा, जल संकट, पर्यावरण संरक्षण और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे विषय व्यापक बहस और ठोस नीतिगत निर्णयों की मांग करते हैं। यदि संसद इन विषयों पर पर्याप्त समय नहीं दे पाएगी तो इसका सीधा असर देश की नीति निर्माण प्रक्रिया पर पड़ेगा।
संसद का प्रत्येक मिनट सार्वजनिक धन से संचालित होता है। हर बार जब सदन बिना कामकाज के स्थगित होता है तो केवल संसदीय समय ही नहीं, बल्कि जनता का विश्वास भी प्रभावित होता है। नागरिक अपने प्रतिनिधियों को इस उम्मीद से चुनते हैं कि वे उनकी समस्याओं का समाधान संसद में तलाशेंगे, न कि केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहेंगे।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि संसद के भीतर होने वाली बहस का स्तर तथ्यपरक, गरिमापूर्ण और समाधान केंद्रित हो। व्यक्तिगत आरोपों, शोर-शराबे और राजनीतिक प्रदर्शन से लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा मजबूत नहीं होती। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी संसद विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों के लिए भी एक उदाहरण मानी जाती रही है। इस गरिमा को बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की साझा जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद को राजनीतिक संघर्ष का अखाड़ा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समाधान का मंच बनाया जाए। सरकार को जवाबदेही स्वीकार करनी होगी और विपक्ष को रचनात्मक सहयोग की परंपरा को मजबूत करना होगा। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति का अर्थ व्यवस्था को ठप करना नहीं हो सकता।
देश की जनता राजनीतिक दलों से टकराव नहीं, समाधान चाहती है। संसद में जितनी अधिक सार्थक बहस होगी, उतना ही मजबूत लोकतंत्र बनेगा और उतना ही अधिक विश्वास नागरिकों का अपने लोकतांत्रिक संस्थानों पर कायम रहेगा।
लोकतंत्र की असली ताकत बहुमत की संख्या में नहीं, बल्कि संवाद, जवाबदेही, पारदर्शिता और जनहित के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता में निहित है। संसद यदि सुचारु रूप से चलेगी तो लोकतंत्र मजबूत होगा, विकास की गति तेज होगी और जनता का विश्वास भी अटूट बना रहेगा।
लोकतंत्र का आईना है संसद, ठप नहीं चलनी चाहिए व्यवस्था


