नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने किशोर अपराध से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि हत्या जैसे जघन्य अपराधों में यदि किशोर की भूमिका गंभीर पाई जाती है, तो उस पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1)) के तहत हत्या का अपराध किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अनुसार “जघन्य अपराध” की श्रेणी में आता है।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने बिहार के एक हत्या मामले में किशोर आरोपी की अपील खारिज करते हुए पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरोपी पर बाल न्यायालय में वयस्क की तरह मुकदमा चलाने की अनुमति दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हत्या ऐसा अपराध है, जिसकी सजा का स्वरूप अत्यंत गंभीर है। इसलिए इसे जघन्य अपराध की श्रेणी में रखा जाएगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को प्रारंभिक मूल्यांकन के दौरान यह देखना होगा कि आरोपी की मानसिक एवं शारीरिक क्षमता, अपराध को समझने की योग्यता तथा अपराध की परिस्थितियां क्या थीं। यदि इन पहलुओं के आधार पर मामला उपयुक्त पाया जाता है, तो उसे वयस्क की तरह मुकदमे के लिए बाल न्यायालय भेजा जा सकता है।
पीठ ने यह भी कहा कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 101(2) के तहत मनोवैज्ञानिक या चिकित्सा विशेषज्ञों की सहायता लेना अदालत का विवेकाधिकार है, यह हर मामले में अनिवार्य नहीं है। हालांकि, यदि अदालत को आवश्यकता महसूस होती है तो वह विशेषज्ञों की राय ले सकती है।
इस फैसले को किशोर अपराधों, विशेषकर हत्या जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और प्रारंभिक मूल्यांकन के आधार पर होगा, लेकिन हत्या जैसे जघन्य अपराधों में कानून का सख्ती से पालन किया जाएगा।


