36 C
Lucknow
Tuesday, July 14, 2026

पश्चिम एशिया में अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक बदलाव के संकेत

Must read

(राज कुमार सिन्हा-विभूति फीचर्स)

ईरान युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिका और इजराइल की रणनीति का एक उद्देश्य सर्वोच्च नेता अली खामनेई की हत्या के बाद ईरान में सत्ता विरोधी जनविद्रोह भड़काना था, जो पूरी तरह विफल हो गई। बल्कि कई मामलों में इसका उल्टा प्रभाव देखने को मिला है। ईरान में शोक कार्यक्रमों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ शांति समझौता समाप्त घोषित किए जाने के बाद, अमेरिका ने क्रेशम द्वीप, सिरिक, बंदर अब्बास और चाबहार समेत कई ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है। जवाबी कार्यवाही में ईरान ने बहरीन, कतर और कुवैत स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले किए हैं। इसके अलावा ईरान ने बुशहर के पास अमेरिका का एक ड्रोन (एमक्यू-9) मार गिराने का दावा किया है। अमेरिका-ईरान के बीच हुए सीजफायर समझौते के खत्म होने के बाद ईरान की रणनीति आक्रामक और सख्त जवाबी कार्यवाही करने पर केंद्रित हो गई है। ईरान स्पष्ट कर चुका है कि वह दबाव के आगे नहीं झुकेगा और अमेरिकी हमलों या प्रतिबंधों का पूरी ताकत से जवाब देगा। यदि अमेरिका प्रतिबंधों को और कड़ा करता है या सैन्य कार्रवाई बढ़ाता है, तो ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को आक्रामक तरीके से फिर से तेज कर सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे ताजा युद्ध का मुख्य कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के नियंत्रण, तेल आपूर्ति मार्गों और क्षेत्र में सामरिक वर्चस्व को लेकर उपजा प्रत्यक्ष सैन्य टकराव है। जून में हुए संघर्ष विराम समझौते के टूटने के बाद से यह विवाद फिर से गहरा गया है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज जलमार्ग से गुजरने वाले वाणिज्यिक तेल टैंकरों को निशाना बनाया है। ईरान इन जहाजों पर अपने नियम-कायदे लागू करना चाहता है। ईरान इस समुद्री मार्ग पर अपना एकाधिकार चाहता है, जबकि अमेरिका इसे एक खुला अंतर्राष्ट्रीय जलमार्ग बनाए रखने के लिए युद्ध के पहले वाली स्थिति बहाल करना चाहता है। ईरान की सेना रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने होर्मुज को बंद करने का एलान कर दिया है। उन्होंने सख्त चेतावनी दी है कि कोई भी जहाज उनकी मंजूरी के बिना इस रास्ते को पार करने की कोशिश न करे। कतर – जार्डन ने अमेरिका और ईरान दोनों देशों से समझौते का पालन करने और बातचीत जारी रखने की अपील की है। साथ ही होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की सुरक्षित आवाजाही बनाए रखने पर जोर दिया है।अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कहा है कि अमेरिका-ईरान तनाव बढ़ा तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और ऊर्जा संकट लंबा खिंच सकता है। ‌ अमेरिका-ईरान संघर्ष और ईरान के नेतृत्व परिवर्तन के बाद पश्चिम एशिया की कूटनीति एक नए संक्रमणकाल में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध के खतरे के बीच, रूस ने अपना बेहद उन्नत टीयू -214 पीयू एयरबोर्न कमांड विमान तेहरान भेजा है। इस कमांड विमान को तेहरान भेजकर रूस ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी ताकतों को एक कड़ा भू-राजनीतिक संदेश दिया है कि वह संकट के समय में ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है। अब यह क्षेत्र केवल सैन्य टकराव का मैदान नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा,ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों और नई भू-राजनीतिक साझेदारियों का केंद्र बन गया है। आने वाले वर्षों में क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की दिशा पर इस संघर्ष का गहरा प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका की अधिकतम दबाव की नीति और ईरान की प्रतिरोध रणनीति के बीच जारी टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल सैन्य शक्ति के आधार पर स्थायी राजनीतिक समाधान संभव नहीं है। इससे क्षेत्रीय देशों ने बहुध्रुवीय कूटनीति को अधिक महत्व देना शुरू किया है। अब अधिकांश देश एक ही शक्ति पर निर्भर रहने के बजाय अमेरिका, चीन, रूस, यूरोपीय देशों और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ समानांतर संबंध विकसित करने की नीति अपना रहे हैं। सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य देशों ने केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय चीन, रूस और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ भी रणनीतिक संबंध मजबूत करने की नीति अपनाई है। साथ ही वे ईरान के साथ संवाद बनाए रखने की भी कोशिश कर रहे हैं ताकि सीधे टकराव से बचा जा सके। चीन की मध्यस्थता में ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंधों की बहाली तथा रूस और ईरान के बढ़ते रणनीतिक सहयोग ने यह संकेत दिया है कि पश्चिम एशिया में अमेरिकी प्रभाव को पहली बार गंभीर वैकल्पिक चुनौती मिल रही है। चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा, बेल्ट एंड रोड पहल और निवेश के माध्यम से क्षेत्र में दीर्घकालिक आर्थिक प्रभाव बढ़ाना चाहता है, जबकि रूस सुरक्षा, रक्षा सहयोग और ऊर्जा समन्वय के जरिए अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। चीन, रूस और ब्रिक्स के विस्तार के संदर्भ में ईरान की बदलती विदेश नीति, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा सहयोग तथा पश्चिम प्रतिबंधों का विकल्प की दिशा में आगे बढने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए दोनों पक्षों के साथ संतुलन साध रहा है। इस युद्ध ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और कूटनीतिक संबंधों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। भारत के दृष्टिकोण से चाबहार बंदरगाह, अंतर्राष्ट्रीय उत्तर- दक्षिण परिवहन गलियारा, ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी समुदाय और संतुलित विदेश नीति की चुनौती होगी। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है तथा उसके व्यापारिक हित होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर के समुद्री मार्गों से जुड़े हुए हैं। इसलिए भारत को अपनी पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के अनुरूप अमेरिका, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की चुनौती और अधिक जटिल होती दिखाई दे रही है। इससे पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पहले की तुलना में अधिक जटिल और बहुध्रुवीय होता जा रहा है। यूरोपीय देशों के सामने भी नई चुनौती खड़ी हुई है। एक ओर वे अमेरिका के सुरक्षा सहयोगी बने रहना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए ईरान तथा खाड़ी देशों के साथ संवाद बनाए रखने की आवश्यकता भी महसूस कर रहे हैं। इससे यूरोपीय कूटनीति में भी अधिक व्यवहारिक और संतुलित दृष्टिकोण उभर सकता है। भारत सहित एशिया के अनेक देशों के लिए भी यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण है। भविष्य में पश्चिम एशिया की राजनीति केवल सैन्य शक्ति से निर्धारित नहीं होगी, बल्कि ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, आर्थिक प्रतिबंधों, प्रौद्योगिकी सहयोग, साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित रक्षा प्रणालियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण जैसे नए कारक भी कूटनीतिक निर्णयों के प्रमुख आधार बनेंगे। इसलिए यह संघर्ष केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय राजनीति के निर्माण की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका-ईरान संघर्ष, ईरान के नेतृत्व परिवर्तन और उसके बाद विकसित घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया अब एक नए भू-राजनीतिक दौर में प्रवेश कर चुका है। सैन्य शक्ति, वैचारिक संघर्ष, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्गों और वैश्विक महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा अब एक-दूसरे से गहराई से जुड़ चुकी है। ईरान ने अपने नेतृत्व परिवर्तन को राजनीतिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकजुटता के प्रदर्शन में बदलने का प्रयास किया है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगियों के सामने क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की चुनौती पहले से अधिक कठिन हो गई है। दूसरी ओर खाड़ी देशों, यूरोप तथा एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने यह महसूस किया है कि बदलती विश्व व्यवस्था में केवल एक महाशक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसी कारण बहुपक्षीय कूटनीति, क्षेत्रीय संवाद और रणनीतिक संतुलन की नई प्रवृत्तियां तेज़ी से उभर रही हैं। आने वाले समय में पश्चिम एशिया की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रतिस्पर्धा और टकराव के बीच संवाद, कूटनीति और पारस्परिक सुरक्षा व्यवस्था को कितना महत्व दिया जाता है।उपरोक्त संदर्भ में वर्तमान परिस्थितियां यह भी संकेत देती हैं कि पश्चिम एशिया धीरे-धीरे अमेरिकी एकध्रुवीय प्रभाव से निकलकर बहुध्रुवीय शक्ति-संतुलन की ओर बढ़ रहा है। चीन का आर्थिक निवेश और मध्यस्थता, रूस का रक्षा एवं सामरिक सहयोग तथा खाड़ी देश क्षेत्रीय संतुलन की राजनीति के माध्यम से नई भूमिका निभा रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि भविष्य की कूटनीति केवल सैन्य गठबंधनों पर आधारित नहीं होगी, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार मार्ग, निवेश, प्रौद्योगिकी और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग भी शक्ति-संतुलन के महत्वपूर्ण आधार बनेंगे। यथार्थवादी दृष्टिकोण से निष्कर्ष यह निकलता है कि अमेरिका, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों की वर्तमान नीतियां किसी वैचारिक टकराव से अधिक अपनी-अपनी सुरक्षा, शक्ति और रणनीतिक हितों की रक्षा तथा क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश हैं। यही प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया की राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दिशा तय करेगी। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय संकट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, समुद्री सुरक्षा और विश्व अर्थव्यवस्था पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। (विभूति फीचर्स)

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article