
प्रो. एच. एन. शर्मा
राम मंदिर सिर्फ एक भव्य मंदिर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, पांच शताब्दियों के संघर्ष और एक ऐतिहासिक जनआंदोलन का प्रतीक है। ऐसे में जब मंदिर के चढ़ावे में कथित गबन और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रहा, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास से जुड़ा विषय बन गया।
यही वजह है कि अब इस पूरे घटनाक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सक्रियता खुलकर सामने आई है। संघ ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में किसी भी प्रकार की लापरवाही या अनियमितता स्वीकार नहीं की जा सकती। संघ के शीर्ष नेतृत्व ने इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच का समर्थन किया है और मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो राम मंदिर निर्माण और चढ़ावे के लिए देश-विदेश से हजारों करोड़ रुपये का योगदान मिला है। ट्रस्ट की सार्वजनिक जानकारी के अनुसार 31 मार्च 2026 तक मंदिर को लगभग 582 करोड़ रुपये का चढ़ावा प्राप्त हुआ था। इसी बीच चढ़ावे के कथित गबन का मामला सामने आने के बाद जांच एजेंसियों ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया और लाखों रुपये की बरामदगी भी की। मामला अब एसआईटी जांच और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी तक पहुंच चुका है।
सूत्रों के अनुसार, आरएसएस की हालिया बैठकों में यह विषय प्रमुखता से उठा। माना जा रहा है कि संघ ने मंदिर ट्रस्ट में प्रोफेशनल मैनेजमेंट, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ ) की नियुक्ति, आधुनिक ऑडिट व्यवस्था और तकनीक आधारित निगरानी प्रणाली लागू करने पर जोर दिया है। यह भी चर्चा है कि भविष्य में मंदिर प्रबंधन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में कई बड़े बदलाव किए जा सकते हैं।
राम मंदिर आंदोलन के शुरुआती दिनों से लेकर मंदिर निर्माण तक आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे में जब मंदिर की साख पर सवाल उठे, तो संघ का हस्तक्षेप केवल संगठनात्मक नहीं बल्कि आस्था से जुड़े दायित्व के रूप में भी देखा जा रहा है।
यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी नहीं माना जा सकता। जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं और अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा। लेकिन यदि जांच में किसी भी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है, तो कार्रवाई भी उतनी ही कठोर होनी चाहिए। यही करोड़ों रामभक्तों की अपेक्षा है।
मेरा मानना है कि राम मंदिर किसी व्यक्ति, पदाधिकारी या संस्था से बड़ा है। मंदिर की गरिमा, श्रद्धालुओं का विश्वास और दान की पवित्रता सर्वोपरि है। इसलिए समय की मांग है कि जांच पूरी पारदर्शिता से हो, दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिले और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए मजबूत एवं आधुनिक प्रबंधन व्यवस्था लागू की जाए।
राम मंदिर पर उठे सवालों का जवाब बयान नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्ष कार्रवाई से ही मिलेगा। यही आस्था का सम्मान भी होगा और करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की सच्ची रक्षा भी।
लेखक पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


