
– मोहित धवन
लखनऊ। अगर कोई यह जानना चाहता है कि लखनऊ की असली पहचान क्या है, तो जवाब सिर्फ बड़ा इमामबाड़ा, रूमी दरवाज़ा, भूलभुलैया या चिकनकारी नहीं है। इस शहर की पहचान उसकी तहज़ीब, अपनापन और उन ठिकानों से भी है, जहां वर्षों से लोग सिर्फ चाय पीने नहीं, बल्कि रिश्ते निभाने, बहस करने, हंसने और यादें बनाने आते रहे हैं। ऐसा ही एक ठिकाना है—हजरतगंज के लालबाग स्थित “शर्मा जी की चाय”, जिसने करीब सात दशकों से लखनऊ की सुबहों को एक अलग ही स्वाद दिया है।
आज भी सुबह होते ही यहां कुल्हड़ों से उठती चाय की भाप, मक्खन से लबालब बन-मक्खन और ताज़ा तले गोल समोसों की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींच लाती है। दुकान के बाहर लगी कतारें इस बात का प्रमाण हैं कि स्वाद का रिश्ता समय से नहीं, भरोसे से बनता है।
हाल के दिनों में यह प्रतिष्ठित दुकान एक बार फिर चर्चा में आई, जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ यहां चाय पीने पहुंचे। तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं और एक बार फिर देशभर में “शर्मा जी की चाय” की चर्चा शुरू हो गई। हालांकि, यह पहला अवसर नहीं था जब किसी बड़े राजनीतिक या सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्ति ने यहां की चाय का स्वाद लिया हो। वर्षों से यह दुकान नेताओं, नौकरशाहों, पत्रकारों, साहित्यकारों, कलाकारों और आम नागरिकों का साझा मिलन स्थल रही है।
इस प्रसिद्ध दुकान की शुरुआत वर्ष 1950 में हुई थी। अलीगढ़ से लखनऊ आए चंद्र प्रकाश शर्मा ने मिट्टी के चूल्हे और कोयले की धीमी आंच पर चाय बनाकर इसकी नींव रखी। उस दौर में चाय कुल्हड़ में परोसी जाती थी और साथ में मक्खन से सजा बन ग्राहकों की पहली पसंद था। समय बदला, शहर आधुनिक हुआ, लेकिन शर्मा जी की चाय का स्वाद और उसकी सादगी आज भी वैसी ही बनी हुई है।
आज इस विरासत को ललित शर्मा आगे बढ़ा रहे हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने बचपन में एक कप चाय 25 पैसे में बिकते देखी थी, जबकि आज उसकी कीमत 20 रुपये है। दुकान रोज़ सुबह लगभग 9 बजे खुलती है और शाम 7:30 बजे तक यहां ग्राहकों की लगातार भीड़ बनी रहती है।
शर्मा जी की पहचान केवल उनकी चाय नहीं, बल्कि उनका गोल समोसा भी है। जहां देशभर में समोसे आमतौर पर त्रिकोण आकार के बनाए जाते हैं, वहीं यहां समोसे को विशेष तरीके से मोड़कर गोल आकार दिया जाता है। यही अनोखी पहचान इसे बाकी दुकानों से अलग बनाती है।
इस गोल समोसे से जुड़ा एक रोचक किस्सा भी वर्षों से लोगों के बीच मशहूर है। वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कई पूर्व मुख्यमंत्री शर्मा जी की चाय और समोसों के बड़े प्रशंसक थे। अक्सर उनके आवास पर यहीं से समोसे भेजे जाते थे। एक बार समोसों की गुणवत्ता को लेकर शिकायत आई तो शर्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा कि उनके समोसे वर्षों से एक जैसे ही बनते हैं, संभव है रास्ते में किसी और दुकान के समोसे पहुंच गए हों। इसके बाद उन्होंने अपने समोसों का आकार बदलकर गोल कर दिया ताकि उनकी पहचान कभी भ्रमित न हो। यद्यपि इस घटना का कोई आधिकारिक दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है, लेकिन लखनऊ की गलियों में यह किस्सा उतनी ही शिद्दत से सुनाया जाता है, जितनी शिद्दत से यहां की चाय पसंद की जाती है।
इस दुकान की सबसे बड़ी खूबी इसकी सादगी और समानता की संस्कृति है। यहां किसी के लिए अलग व्यवस्था नहीं होती। नेता, मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी, पत्रकार, छात्र, व्यापारी या आम नागरिक—हर व्यक्ति एक ही कतार में खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार करता है। शायद यही लोकतांत्रिक अपनापन इस दुकान को केवल एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि लखनऊ की सामाजिक संस्कृति का जीवंत प्रतीक बनाता है।
आज जब महानगरों में बड़े-बड़े कैफे और अंतरराष्ट्रीय कॉफी चेन युवाओं को आकर्षित करने की होड़ में हैं, तब भी शर्मा जी की चाय अपनी गुणवत्ता, विश्वास और आत्मीयता के बल पर मजबूती से खड़ी है। यहां आने वाले लोगों के लिए चाय केवल एक पेय नहीं, बल्कि पुरानी यादों, दोस्ती, बहस, मुलाकात और लखनऊ की तहज़ीब से जुड़ने का एक माध्यम है।
यही कारण है कि राजधानी आने वाला लगभग हर पर्यटक और लखनऊ का हर पुराना बाशिंदा कम से कम एक बार शर्मा जी की चाय का स्वाद अवश्य लेना चाहता है। क्योंकि यहां कुल्हड़ में केवल चाय नहीं उबलती, बल्कि हर घूंट के साथ लखनऊ की संस्कृति, अपनापन और अनगिनत यादें भी जीवंत हो उठती हैं।


