यूथ इंडिया
भारत में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक की नींव रखने वाले पद्मश्री डॉ. लालजी सिंह का नाम भारतीय विज्ञान के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उन्होंने देश में डीएनए प्रोफाइलिंग तकनीक की शुरुआत की और इसे भारतीय न्याय व्यवस्था में वैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में स्थापित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके शोध ने अपराधों की जांच, पारिवारिक विवादों के समाधान, मानव पहचान और वन्यजीव संरक्षण जैसे अनेक क्षेत्रों में नई दिशा प्रदान की।
डॉ. लालजी सिंह का जन्म 5 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कलवारी गांव में हुआ था। साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर उन्होंने अपनी प्रतिभा, परिश्रम और वैज्ञानिक दृष्टि के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त की और यहीं से उनके वैज्ञानिक जीवन की मजबूत नींव पड़ी।
डॉ. सिंह की सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियों में ‘बैंडेड क्रेट माइनर प्रोब’ की खोज शामिल है। इसी खोज ने भारत में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। यह तकनीक अपराधों की जांच, पितृत्व संबंधी मामलों, मानव पहचान तथा न्यायिक प्रक्रियाओं में वैज्ञानिक प्रमाण के रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। उनके अथक प्रयासों के कारण भारतीय अदालतों में डीएनए परीक्षण को कानूनी मान्यता मिलने का रास्ता भी आसान हुआ।
वैज्ञानिक नेतृत्व के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कोशिका एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र, हैदराबाद के निदेशक के रूप में कार्य किया। साथ ही डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एवं निदान केंद्र की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण की प्रयोगशाला की भी स्थापना की, जहां आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से संकटग्रस्त वन्यजीवों के संरक्षण पर कार्य किया गया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी डॉ. लालजी सिंह का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने अगस्त 2011 से अगस्त 2014 तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 25वें कुलपति के रूप में कार्य किया। उनके कार्यकाल में अनुसंधान, नवाचार और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन मिला तथा विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक अनुसंधान की संस्कृति को नई दिशा प्राप्त हुई।
भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2004 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। यह सम्मान उनके वैज्ञानिक शोध, नवाचार और राष्ट्र निर्माण में योगदान का राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान था।
10 दिसंबर 2017 को डॉ. लालजी सिंह का निधन हो गया, लेकिन उनके वैज्ञानिक कार्य आज भी देश-विदेश के वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बने हुए हैं। उन्होंने यह साबित किया कि यदि प्रतिभा, मेहनत और दृढ़ संकल्प हो तो ग्रामीण पृष्ठभूमि से निकलकर भी विश्व विज्ञान के मंच पर अपनी अलग पहचान बनाई जा सकती है।
आज उनकी जयंती पर पूरा देश इस महान वैज्ञानिक को श्रद्धापूर्वक नमन करता है। डॉ. लालजी सिंह केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि भारतीय विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार की उस प्रेरणादायक परंपरा के प्रतीक थे, जिसने देश को वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया। आने वाली पीढ़ियों के लिए उनका जीवन समर्पण, अनुसंधान और राष्ट्रसेवा का एक उज्ज्वल उदाहरण बना रहेगा।


