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Saturday, June 13, 2026

माफिया पर शिकंजा कसने वाली पुलिस खुद झूठी शिकायतों के घेरे में

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– कानूनी दबाव से कमजोर पड़ रही जीरो टोलरेंस कार्रवाई
– माफिया पर अभियान चलाने वाले जवाज़ो पर डाली जा रहीं याचिकाएं
– अब तक करीब 30 याचिका उच्च न्यायालय में कराई गईं दर्ज

फर्रुखाबाद। जनपद में संगठित अपराध और कथित माफिया नेटवर्क के खिलाफ चल रही पुलिस कार्रवाई थमने के मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं के अनुसार, माफिया सरगना अनुपम दुबे एवं उससे जुड़े नेटवर्क के विरुद्ध कार्रवाई करने वाले पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ लगातार शिकायतें, प्रार्थना पत्र और न्यायालयी याचिकाएं दाखिल की जा रही हैं। इससे पुलिस महकमे में दबाव और असमंजस की स्थिति बनने की चर्चा तेज हो गई है।अकेले 2017 से अब तक माफिया तंत्र द्वारा अपने प्रमुख सदस्य नॉन प्रैक्टिशनर वकील अवधेश मिश्रा द्वारा उच्च न्यायालय इलाहाबाद में 30 याचिकाएं दाखिल कराईं हैं, जिनमे पुलिस अधीक्षक कन्नौज फर्रुखाबाद समेत शासन के आला अधिकारी भी पार्टी बनाए गए हैं।जबकि उसके विरुद्ध खुद 10 आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं।

बताया जा रहा है कि पुलिस अधीक्षक से लेकर विभिन्न थानों के प्रभारी निरीक्षकों और थानाध्यक्षों के विरुद्ध शासन, पुलिस मुख्यालय तथा न्यायिक मंचों, पुलिस अधिसूचना विभाग तक शिकायतें भेजी जा रही हैं। कई मामलों में अधिकारियों को अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का जवाब देने और विभागीय जांचों में समय देना पड़ रहा है। इसके चलते अपराध नियंत्रण और माफिया विरोधी अभियानों की गति प्रभावित होने लगी है। शुक्रवार को झांसी से आए पुलिस उपाधीक्षक अधिसूचना ने तमाम पुलिसकर्मियों के बयान नोट किये।
माफिया तंत्र पर प्रभावी कार्रवाई रोकने के उद्देश्य से कानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेकर पुलिस कार्रवाई पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाई गईं हैं।साथ ही माफिया नेटवर्क से जुड़े लोगों के विरुद्ध कार्रवाई करने वाले अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया जा रहा है, जिससे पुलिस बल के भीतर संदेश जा रहा है कि कठोर कार्रवाई के बाद उन्हें स्वयं कानूनी लड़ाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
सवाल उठ रहा है कि यदि पुलिस का बड़ा हिस्सा अपने ही खिलाफ दर्ज शिकायतों और जांचों में उलझा रहेगा, तो संगठित अपराध, भू-माफिया और आर्थिक अपराधों के विरुद्ध अभियान की धार कितनी प्रभावी रह पाएगी। जानकारों का मानना है कि अपराध के खिलाफ कार्रवाई और अधिकारियों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

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