– शरद कटियार
भारत की लोकतांत्रिक राजनीति में पिछले तीन दशकों के दौरान सबसे बड़ा परिवर्तन केवल सरकारों का नहीं, बल्कि समाज की सोच का हुआ है। एक समय था जब राजनीति में विचारधारा, संघर्ष, त्याग और सार्वजनिक जीवन की साख सबसे बड़ी पूंजी मानी जाती थी। आज का दौर आर्थिक शक्ति, जातीय समीकरण, सोशल मीडिया प्रभाव और चुनावी प्रबंधन के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 1990 के दशक तक राष्ट्रीय राजनीति में ऐसे नेताओं का प्रभाव था जिनकी पहचान उनके वैचारिक संघर्ष और जनआंदोलनों से बनती थी। वहीं 2020 के दशक में चुनावी सफलता का बड़ा आधार सामाजिक गठबंधन, संसाधन क्षमता और डिजिटल पहुंच बन गया है।
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का उदाहरण भारतीय राजनीति में अक्सर राजनीतिक नैतिकता और आत्मसम्मान के संदर्भ में दिया जाता है। 1990-91 में प्रधानमंत्री रहे चंद्रशेखर अपनी बेबाकी और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति के लिए जाने जाते थे। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा लंबे समय से होती रही है कि चुनावी पराजय के बाद उन्होंने राज्यसभा के रास्ते संसद में प्रवेश करने के बजाय जनादेश का सम्मान करना अधिक उचित माना। हालांकि इस विषय पर अलग-अलग राजनीतिक संस्मरण और व्याख्याएं उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी सार्वजनिक छवि एक ऐसे नेता की रही जो सत्ता से अधिक जनसंघर्ष को महत्व देता था।
भारत में 1951-52 के पहले आम चुनाव में मतदाताओं की संख्या लगभग 17.3 करोड़ थी। 2024 के लोकसभा चुनाव तक यह संख्या बढ़कर 96 करोड़ से अधिक हो गई। लोकतंत्र का विस्तार हुआ, लेकिन राजनीतिक विमर्श में भी बड़ा बदलाव आया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि पहले किसी नेता का मूल्यांकन उसके आंदोलन, जेल यात्रा, संगठन निर्माण और वैचारिक प्रतिबद्धता से होता था। आज नेता की लोकप्रियता का आकलन सोशल मीडिया फॉलोअर्स, चुनावी जीत और जातीय समीकरणों के आधार पर अधिक किया जाता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थक अक्सर इस तथ्य का उल्लेख करते हैं कि उन्होंने अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी संभाली थी। इस आधार पर 2026 में उन्हें किसी न किसी संवैधानिक पद पर लगभग 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं।यही रिकॉर्ड जवाहर लाल नेहरू का रहा।
प्रधानमंत्री कार्यालय और विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों में कई बार यह कहा गया है कि मोदी ने लंबे सार्वजनिक जीवन में अत्यंत व्यस्त कार्यशैली बनाए रखी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने वर्षों तक प्रतिदिन औसतन 18 घंटे कार्य करते हुए राष्ट्रसेवा को प्राथमिकता दी।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मोदी भारत के उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने लगातार चार लोकसभा चुनावों (2004 में संगठनात्मक भूमिका, 2014, 2019 और 2024 में नेतृत्वकारी भूमिका) के राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित किया है। 2014 से 2024 के बीच भाजपा का लोकसभा सीट आंकड़ा 282 से बढ़कर 303 और फिर 240 पर पहुंचा, जबकि राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बिंदु लगातार मोदी ही बने रहे।
भारत में जाति आधारित राजनीति नई नहीं है। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति ने नया आयाम प्राप्त किया। लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सामाजिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता और जातीय ध्रुवीकरण के बीच एक महीन अंतर है।
आज कई राज्यों में चुनावी टिकट वितरण से लेकर मंत्रीमंडल गठन तक जातीय गणित निर्णायक भूमिका निभाता है। वहीं दूसरी ओर ऐसे भी उदाहरण मौजूद हैं जहां व्यक्तित्व, कार्यशैली और विकास आधारित राजनीति ने जातीय सीमाओं को चुनौती दी है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी विभिन्न सर्वेक्षणों ने संकेत दिया कि मतदाताओं का बड़ा वर्ग जाति के साथ-साथ नेतृत्व, कल्याणकारी योजनाओं और राष्ट्रीय मुद्दों को भी मतदान का आधार बना रहा था।
आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत की प्रति व्यक्ति आय में कई गुना वृद्धि हुई है। विश्व बैंक और सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1991 के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार कई गुना बढ़ चुका है। इसके साथ ही सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाना भी बदला है।
पहले किसी व्यक्ति की पहचान उसके ज्ञान, सामाजिक योगदान और सार्वजनिक जीवन से होती थी। आज अक्सर उसकी आर्थिक हैसियत, नेटवर्क और सामाजिक प्रभाव से मूल्यांकन किया जाता है। यही कारण है कि “अर्थयुग” शब्द का प्रयोग बढ़ते आर्थिक प्रभाव को दर्शाने के लिए किया जाता है।
सभी आलोचनाओं और बदलावों के बावजूद भारत की लोकतांत्रिक संस्थाएं लगातार कार्य कर रही हैं। इसका बड़ा कारण वे लाखों लोग हैं जो बिना चर्चा में आए अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी से काम कर रहे हैं—चाहे वे शिक्षक हों, सैनिक, डॉक्टर, वैज्ञानिक, किसान, पत्रकार या प्रशासनिक अधिकारी।
देश की संस्थागत व्यवस्था केवल नेताओं से नहीं, बल्कि उन अनगिनत व्यक्तियों से संचालित होती है जो नियम, कर्तव्य और उत्तरदायित्व को व्यक्तिगत लाभ से ऊपर रखते हैं।
समय बदलता है तो राजनीति की भाषा, समाज की प्राथमिकताएं और सफलता के मानदंड भी बदल जाते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंततः वही व्यक्तित्व लंबे समय तक याद रखे जाते हैं जिन्होंने पद से अधिक सिद्धांत, सत्ता से अधिक सेवा और लाभ से अधिक राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी।
चाहे चंद्रशेखर जैसे संघर्षशील नेता हों या नरेंद्र मोदी और नेहरू जैसे लंबे समय तक सत्ता में रहकर राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने वाले नेता दोनों उदाहरण एक सवाल छोड़ते हैं, क्या लोकतंत्र में व्यक्ति की पहचान उसकी जाति और आर्थिक स्थिति से होगी, या उसके योगदान और चरित्र से?यही प्रश्न आने वाले भारत की राजनीतिक और सामाजिक दिशा तय करेगा।


