शरद कटियार
राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, वैचारिक संघर्ष हो सकता है, आरोप-प्रत्यारोप भी लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन जब राजनीतिक लड़ाई नेताओं से निकलकर उनके परिवारों, विशेषकर बेटियों तक पहुंचने लगे, तो यह केवल राजनीतिक गिरावट नहीं बल्कि सामाजिक पतन का संकेत भी है।
इन दिनों समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पुत्री अदिति यादव को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह की टिप्पणियां और राजनीतिक छींटाकशी देखने को मिली, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या राजनीति अब इतनी कुंठित हो चुकी है कि उसमें बेटियों की गरिमा भी सुरक्षित नहीं बची?
अदिति यादव हों, मैथिली ठाकुर हों या देश के किसी सामान्य परिवार की बेटी, उनकी पहचान किसी राजनीतिक दल, जाति या विचारधारा से पहले एक बेटी की है। बेटियां किसी पार्टी की संपत्ति नहीं होतीं, वे समाज की धरोहर होती हैं। उनके सम्मान पर चोट किसी एक परिवार पर नहीं, पूरे समाज की संस्कृति पर हमला होती है।
भारतीय सभ्यता ने हमेशा नारी को शक्ति का स्वरूप माना है। घर की बेटी को लक्ष्मी और दुर्गा का रूप कहने वाला समाज यदि राजनीतिक लाभ के लिए उन्हीं बेटियों को निशाना बनाने लगे तो यह आत्ममंथन का विषय है। चुनाव जीतने और राजनीतिक बढ़त हासिल करने की होड़ में यदि मर्यादा का अंतिम धागा भी टूट गया, तो फिर लोकतंत्र और भीड़तंत्र में कोई अंतर नहीं बचेगा।
यह समझना होगा कि किसी नेता की आलोचना और उसकी बेटी पर टिप्पणी, दोनों अलग-अलग बातें हैं। लोकतंत्र में नेता जनता के सवालों के लिए जवाबदेह हैं, लेकिन उनके बच्चे और परिवार राजनीतिक हमलों के पात्र नहीं हो सकते। जो लोग बेटियों को ट्रोल कर अपनी राजनीतिक निष्ठा साबित करना चाहते हैं, वे वास्तव में अपनी मानसिक दरिद्रता का प्रदर्शन कर रहे होते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज ने महिलाओं और बेटियों के सम्मान की उपेक्षा की, तब-तब उसका नैतिक पतन तेज हुआ। सोशल मीडिया के दौर में शब्द भी हथियार बन चुके हैं। इसलिए यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि राजनीतिक समर्थक और नेता दोनों अपनी भाषा की मर्यादा बनाए रखें।
राजनीतिक विरोध कीजिए, विचारधारा पर हमला कीजिए, नीतियों पर सवाल उठाइए, लेकिन बेटियों को निशाना बनाकर कोई सम्मान नहीं कमाया जा सकता। जो लोग यह भूल रहे हैं, उन्हें याद रखना चाहिए कि हर घर में एक बेटी है और हर बेटी किसी न किसी का अभिमान है।
आज जरूरत इस बात की नहीं कि हम यह देखें कि अदिति यादव किस दल के नेता की बेटी हैं। जरूरत इस बात की है कि हम यह तय करें कि क्या हम अपनी बेटियों के लिए सम्मानजनक सामाजिक वातावरण छोड़ना चाहते हैं या राजनीतिक नफरत का ऐसा दलदल, जहां किसी की भी बेटी सुरक्षित न रहे।
बेटियां वोट बैंक नहीं होतीं। वे भविष्य होती हैं। वे राजनीति का विषय नहीं, समाज की गरिमा होती हैं। और जब गरिमा पर हमला होता है, तो उसका जवाब किसी दल का कार्यकर्ता नहीं, पूरा समाज देता है।
राजनीतिक लड़ाई नेताओं से लड़िए, लेकिन बेटियों को बीच में लाने की हिमाकत मत कीजिए। क्योंकि जहां बेटियों के सम्मान का प्रश्न खड़ा होता है, वहां दल, विचारधारा और राजनीति सब पीछे छूट जाते हैं।
— शरद कटियार
प्रधान संपादक, यूथ इंडिया


