
– शरद कटियार
भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं है। यह ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और आचार्यों की परंपरा से निर्मित एक जीवंत सभ्यता है। इस सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आध्यात्मिक परंपरा रही है। यही कारण है कि यहां राजा से अधिक सम्मान ऋषि को और सत्ता से अधिक प्रतिष्ठा संत को प्राप्त हुई।
लेकिन कन्नौज और फर्रुखाबाद की हालिया घटनाओं ने एक ऐसा प्रश्न खड़ा कर दिया है, जिस पर हर सनातनी को आत्ममंथन करना चाहिए।
एक ओर फर्रुखाबाद, जिसे पुराणों में वर्णित भगवान शिव की तपोभूमियों से जोड़कर देखा जाता है और जिसे अनेक विद्वान “अपर काशी” की संज्ञा देते हैं, वहां ज्योतिषपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का अभूतपूर्व स्वागत हुआ। दूसरी ओर इत्र की विश्व प्रसिद्ध नगरी कन्नौज में उनके प्रवास के दौरान सामने आई तस्वीरों ने करोड़ों सनातनियों को विचलित कर दिया।
शंकराचार्य केवल व्यक्ति नहीं, सनातन परंपरा का सर्वोच्च पद है,
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि शंकराचार्य का महत्व क्या है।
आदि गुरु ने लगभग 1200 वर्ष पूर्व भारत को सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से एक सूत्र में बांधने के लिए चार प्रमुख मठों की स्थापना की थी। देशभर में करोड़ों सनातनी इन पीठों को सर्वोच्च आध्यात्मिक प्राधिकार मानते हैं।
आज भी शंकराचार्य का पद किसी राजनीतिक पद से बड़ा इसलिए माना जाता है क्योंकि यह सत्ता नहीं, बल्कि धर्म, दर्शन और परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
भारत में लगभग 80 करोड़ से अधिक लोग स्वयं को सनातन परंपरा से जोड़ते हैं। ऐसे में शंकराचार्य किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जगतगुरु शंकराचार्य के फर्रुखाबाद आगमन पर जो दृश्य दिखाई दिए, वे भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा को प्रदर्शित करते हैं।
जहानगंज चौराहे से लेकर पांडा बाग स्थित महाभारत कालीन पांडेश्वर नाथ मंदिर, बिजाधरपुर पाल नगला के शिव शक्ति मंदिर, फतेहगढ़, मिलिट्री मंदिर, भोलेपुर के प्राचीन शिवालय और बढ़पुर स्थित शीतला माता मंदिर तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती रही।
सैकड़ों नहीं, हजारों श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर उनका स्वागत किया। गौ रक्षा, सनातन संस्कृति और धर्म रक्षा के संकल्प लिए गए। यह सम्मान किसी व्यक्ति का नहीं बल्कि उस परंपरा का था जिसने भारत को हजारों वर्षों तक जोड़े रखा।
विशेष रूप से महाभारत कालीन पांडेश्वर नाथ मंदिर में शंकराचार्य द्वारा भगवान शिव की आराधना ने पूरे कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान की।
इसके विपरीत कन्नौज से सामने आई तस्वीरों ने सनातन समाज को बेचैन कर दिया।
यदि वास्तव में देश के एक शंकराचार्य को सड़क किनारे टेंट में रात्रि विश्राम करना पड़ा और उनके साथ चल रहे संतों को फुटपाथ पर रात बितानी पड़ी, तो यह केवल व्यवस्था की कमी नहीं बल्कि हमारी सामाजिक चेतना पर प्रश्नचिह्न है।
विडंबना यह है कि राजनीतिक नेताओं के लिए सरकारी संसाधनों के दरवाजे खुल जाते हैं, लेकिन जब देश की प्राचीनतम आध्यात्मिक परंपरा के प्रतिनिधि आते हैं तो सम्मानजनक व्यवस्था तक सुनिश्चित नहीं हो पाती।
यह प्रश्न किसी सरकार, दल या अधिकारी विशेष का नहीं है। यह प्रश्न पूरे समाज का है।
स्कंद पुराण, शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में बार-बार कहा गया है कि संतों, तपस्वियों और धर्माचार्यों का सम्मान स्वयं देवताओं के सम्मान के समान माना जाता है।
सनातन परंपरा में “अतिथि देवो भवः” केवल एक वाक्य नहीं बल्कि जीवन दर्शन है। संतों के प्रति सम्मान को पुण्य और उनके अपमान को पाप की श्रेणी में रखा गया है।महाभारत में भीष्म पितामह कहते हैं कि जिस समाज में विद्वानों और धर्माचार्यों का सम्मान समाप्त हो जाता है, वहां नैतिक पतन की शुरुआत हो जाती है।
सवाल यह नहीं कि शंकराचार्य को पांच सितारा सुविधाएं मिलीं या नहीं।सवाल यह है कि क्या हम अपनी आध्यात्मिक परंपराओं का सम्मान करना भूलते जा रहे हैं?
क्या सनातन केवल राजनीतिक नारा बनकर रह गया है?
क्या धर्माचार्यों का सम्मान अब केवल मंचों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित हो गया है?
फर्रुखाबाद और कन्नौज की तस्वीरें दो अलग-अलग संदेश देती हैं। एक तस्वीर बताती है कि समाज आज भी अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है। दूसरी तस्वीर चेतावनी देती है कि यदि हमने अपनी आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता खो दी, तो हम केवल इमारतें और सड़कें तो बना लेंगे, लेकिन अपनी सभ्यता की आत्मा खो बैठेंगे।
क्योंकि किसी शंकराचार्य का सम्मान या अपमान केवल एक व्यक्ति का सम्मान या अपमान नहीं होता, वह भारत की हजारों वर्ष पुरानी आध्यात्मिक विरासत के प्रति हमारे व्यवहार का प्रतिबिंब होता है।
और यही कारण है कि कन्नौज की वह रात केवल एक घटना नहीं, बल्कि सनातन समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन गई है।


