शरद कटियार
ग्रेटर नोएडा की एक सोसायटी में निकला कैंडल मार्च सिर्फ एक बेटी त्विषा शर्मा को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उस दर्द, बेबसी और आक्रोश की अभिव्यक्ति थी जो आज देश के लाखों परिवार महसूस करते हैं। जब एक पिता यह कहता है कि उसकी लड़ाई केवल अपनी बेटी के लिए नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के खिलाफ है, तब यह बयान किसी एक परिवार का दुख नहीं रह जाता, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने खड़े एक बड़े सवाल में बदल जाता है।
एक बेटी की मौत के बाद सबसे पहले न्याय की उम्मीद होती है। लेकिन यदि पीड़ित परिवार को एफआईआर दर्ज कराने के लिए संघर्ष करना पड़े, अधिकारियों के दरवाजे खटखटाने पड़ें और अपनी आवाज सुनाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। जब इस प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तब लोगों का भरोसा कमजोर पड़ता है।
त्विषा अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसके नाम पर उठी आवाजें हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि आखिर हमारी बेटियां कब तक असुरक्षा, सामाजिक दबाव और कथित रसूख के बीच पिसती रहेंगी। हर बार किसी बेटी की असामयिक मौत के बाद मोमबत्तियां जलती हैं, नारे लगते हैं, जांच बैठती है और फिर धीरे-धीरे मामला सुर्खियों से ओझल होने लगता है। सबसे बड़ा खतरा यही है कि कहीं न्याय की मांग भी समय के साथ खबरों के शोर में दब न जाए।
आज जरूरत केवल दोषियों को सजा दिलाने की नहीं है। जरूरत इस बात की भी है कि जांच एजेंसियां निष्पक्षता और पारदर्शिता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करें, जिससे हर नागरिक का विश्वास मजबूत हो। यदि किसी परिवार को यह महसूस हो कि प्रभावशाली लोगों के कारण न्याय प्रभावित हो सकता है, तो यह भावना स्वयं में व्यवस्था के लिए एक गंभीर चेतावनी है।
एक समाज के रूप में हमें भी आत्ममंथन करना होगा। बेटियों की शिकायतों, उनके डर, उनकी भावनाओं और उनके संघर्षों को समय रहते समझना होगा। कई बार दुखद घटनाएं अचानक नहीं होतीं, बल्कि उनके संकेत पहले से मौजूद होते हैं, जिन्हें परिवार और समाज नजरअंदाज कर देता है।
आज त्विषा के पिता की आंखों में केवल अपनी बेटी को खोने का दर्द नहीं है, बल्कि यह चिंता भी है कि कहीं किसी और पिता को भविष्य में यही पीड़ा न सहनी पड़े। यही कारण है कि यह लड़ाई अब एक परिवार की निजी लड़ाई नहीं रह गई है। यह उस विश्वास को बचाने की लड़ाई है कि इस देश में कानून सबके लिए बराबर है और किसी भी बेटी की जिंदगी किसी रसूख, पद या प्रभाव से छोटी नहीं हो सकती।
यही उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी, सच सामने आएगा और न्याय केवल कागजों तक सीमित नहीं रहेगा। क्योंकि जब किसी बेटी को न्याय मिलता है, तब केवल एक परिवार को राहत नहीं मिलती, बल्कि पूरे समाज का लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होता है।


