शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की नौकरशाही एक बार फिर चर्चाओं के केंद्र में है। वजह है हाल के दिनों में हुए तबादले और उसके बाद कुछ अधिकारियों के तबादला आदेशों का निरस्त होना। सरकारी तंत्र में तबादला कोई असामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह प्रशासनिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन जब बड़ी संख्या में जारी आदेश वापस होने लगें तो सवाल केवल आदेशों पर नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर उठने लगते हैं।
सूत्रों के अनुसार एक दर्जन से अधिक पीसीएस अधिकारियों ने अपने तबादला आदेश रुकवाने में सफलता हासिल की है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब सरकार लगातार सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठना लाजिमी है कि यदि तबादला प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर किए गए थे तो फिर उन्हें वापस लेने की जरूरत क्यों पड़ी? और यदि आदेश वापस लिए गए तो क्या प्रारंभिक तबादला प्रक्रिया में कोई कमी थी?
नौकरशाही के गलियारों में इन दिनों सबसे अधिक चर्चा इसी बात की है कि आखिर वह कौन सी व्यवस्था है जिसके सहारे कुछ अधिकारी अपने लिए राहत हासिल कर लेते हैं, जबकि अधिकांश अधिकारी आदेश का पालन करने को मजबूर होते हैं। यह चर्चा केवल सचिवालय तक सीमित नहीं है, बल्कि जिलों और मंडलों तक पहुंच चुकी है।
प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी निष्पक्षता होती है। जब यह धारणा बनने लगे कि कुछ लोगों के लिए नियम अलग और बाकी के लिए अलग हैं, तब व्यवस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। यही कारण है कि तबादला आदेशों के निरस्तीकरण को लेकर उठ रहे सवालों को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
दिलचस्प तथ्य यह भी है कि नियुक्ति विभाग की कमान ऐसे अधिकारी के हाथों में है जिन्हें उनकी सख्त कार्यशैली और स्पष्ट निर्णयों के लिए जाना जाता है। ऐसे में यदि बड़े स्तर पर आदेशों में परिवर्तन हुआ है तो इसके पीछे के कारणों को सार्वजनिक किया जाना और भी आवश्यक हो जाता है। पारदर्शिता केवल निर्णय लेने में नहीं, बल्कि निर्णय बदलने में भी दिखाई देनी चाहिए।
यह भी संभव है कि कुछ अधिकारियों के व्यक्तिगत, पारिवारिक या स्वास्थ्य संबंधी कारण रहे हों। प्रशासनिक आवश्यकताएं भी कई बार निर्णयों में संशोधन की मांग करती हैं। लेकिन यदि ऐसा है तो सरकार और विभाग को स्पष्ट रूप से यह बताना चाहिए कि किन आधारों पर आदेशों में बदलाव किया गया। इससे अनावश्यक अटकलों और अफवाहों पर स्वतः विराम लग जाएगा।
उत्तर प्रदेश जैसा विशाल राज्य केवल आदेशों से नहीं, बल्कि व्यवस्था पर जनता और कर्मचारियों के विश्वास से चलता है। यदि तबादला प्रक्रिया को लेकर संदेह पैदा होता है तो उसका असर प्रशासनिक मनोबल पर भी पड़ता है। जो अधिकारी नियमों का पालन करते हुए नई तैनाती स्वीकार कर लेते हैं, उनके मन में भी स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि तबादला प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और सार्वजनिक मानकों पर आधारित बनाया जाए। किस अधिकारी का तबादला क्यों हुआ और किसका आदेश किस कारण से निरस्त हुआ, इसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा होनी चाहिए। इससे न केवल व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा बल्कि तथाकथित “मैनेजमेंट संस्कृति” की चर्चाओं पर भी विराम लगेगा।
सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति तभी प्रभावी मानी जाएगी जब प्रशासनिक निर्णयों पर उठने वाले हर सवाल का जवाब तथ्यों और पारदर्शिता के साथ दिया जाएगा। अन्यथा तबादलों के पीछे चलने वाली चर्चाएं और अफवाहें ही व्यवस्था की वास्तविक छवि तय करती रहेंगी।
सवाल केवल कुछ तबादलों का नहीं है, सवाल उस विश्वास का है जिस पर पूरी प्रशासनिक व्यवस्था टिकी हुई है।यह संपादकीय खोजी और सवाल उठाने वाली शैली में लिखा गया है, लेकिन इसमें किसी अप्रमाणित आरोप को तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।


