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Thursday, May 28, 2026

विद्वानों की संगति से ही महान बनता है राष्ट्र नेतृत्व: प्रोफेसर एच.एन.शर्मा

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प्रोफेसर एच.एन.शर्मा

“यस्य शर्मन्नुप विश्वे जनास एवैस्तस्थुः सुमतिं भिक्षमाणाः। वैश्वानरो वरमा रोदस्योराग्निः ससाद पित्रोरुपस्थम्॥”
ऋग्वेद का यह मंत्र केवल आध्यात्मिक चेतना का संदेश नहीं देता, बल्कि आदर्श शासन, राष्ट्र नेतृत्व और सत्ता के चरित्र का भी गहरा दर्शन प्रस्तुत करता है। वेद स्पष्ट संकेत देते हैं कि वही शासक, वही राजा और वही नेतृत्व दीर्घकाल तक सम्मान और सफलता प्राप्त करता है, जिसके आसपास विद्वान, चरित्रवान, सत्य बोलने वाले और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानने वाले सलाहकार उपस्थित रहते हैं। जहां सत्ता के निकट ज्ञान और सत्य समाप्त हो जाता है, वहां पतन की शुरुआत तय मानी जाती है।

आज भारत सहित पूरी दुनिया की राजनीति ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां नेतृत्व की विश्वसनीयता और नैतिकता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को केवल शासन चलाने के लिए नहीं चुनती, बल्कि उनसे न्याय, दूरदृष्टि और नैतिक दिशा की भी अपेक्षा करती है। लेकिन जब राजनीति में चाटुकारिता, अवसरवाद और निजी स्वार्थ हावी होने लगते हैं, तब व्यवस्था का संतुलन धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगता है।

मुझे देश के पूर्व प्रधानमंत्री और युवा तुर्क के नाम से प्रसिद्ध चंद्रशेखर जी के साथ राजनीतिक सलाहकार के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। मैंने उनके व्यक्तित्व में एक विशेष गुण हमेशा देखा वे अपने आसपास ऐसे लोगों को रखना पसंद करते थे जो सच बोलने का साहस रखते हों। चंद्रशेखर जी मानते थे कि केवल प्रशंसा सुनने वाला नेतृत्व धीरे-धीरे वास्तविकता से कट जाता है। यही कारण था कि वे वैचारिक बहस, संवाद और स्पष्ट सोच को राजनीति की आत्मा मानते थे।

आज राजनीति में सबसे बड़ा संकट “सत्य बोलने वालों” की कमी का दिखाई देता है। अधिकांश नेता अपने आसपास ऐसे लोगों की भीड़ खड़ी कर लेते हैं जो केवल उनकी हां में हां मिलाते हैं। परिणामस्वरूप सत्ता आम जनता की वास्तविक समस्याओं से दूर होती चली जाती है। जनता बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महंगाई और सामाजिक असुरक्षा से जूझती रहती है, जबकि सत्ता का बड़ा हिस्सा केवल प्रचार और प्रबंधन में व्यस्त दिखाई देता है।

ऋग्वेद का यह मंत्र हमें यह भी सिखाता है कि शासन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व है। एक सच्चा शासक वही है जो आलोचना सुन सके, विद्वानों का सम्मान करे और सत्य को स्वीकार करने का साहस रखे। सूर्य की तरह प्रकाशमान नेतृत्व वही बनता है जो ज्ञान और चरित्र के मार्ग पर चलता है।

चंद्रशेखर जी की राजनीति में वैचारिक संघर्ष था, जनसंवाद था और राष्ट्रहित सर्वोपरि था। उन्होंने सत्ता को लक्ष्य नहीं बल्कि समाज परिवर्तन का माध्यम माना। आज के दौर में जब राजनीति कई बार केवल चुनाव जीतने और सत्ता बचाने तक सीमित दिखाई देती है, तब ऐसे नेताओं की याद और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

देश का भविष्य केवल मजबूत सरकारों से नहीं बल्कि मजबूत विचारों से बनता है। और मजबूत विचार वहीं जन्म लेते हैं जहां विद्वानों, चिंतकों और सत्य बोलने वालों का सम्मान होता है। यदि राजनीति को फिर से समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण का माध्यम बनाना है, तो नेतृत्व को अपने आसपास ऐसे लोगों को स्थान देना होगा जो सच बोल सकें, भले वह कड़वा ही क्यों न हो।

ऋग्वेद का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है राष्ट्र वही आगे बढ़ता है, जहां सत्ता के निकट ज्ञान, चरित्र और सत्य का प्रकाश जीवित रहता है।

लेखक पूर्व प्रधानमंत्री युवा तुर्क चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।

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