सिस्टम
(अंजनी सक्सेना-विभूति फीचर्स)
परीक्षा का डर बच्चों के लिए नया नहीं है। मगर इस बार केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानि सीबीएसई ने डर की नई इबारत लिख दी है। रिजल्ट आने के बाद बच्चे प्रश्नपत्र पर नहीं, अपनी ही उत्तर पुस्तिका पर शक कर रहे हैं। 12वीं बोर्ड परीक्षा 2025-26 में ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम को पारदर्शिता का पुल बताया गया था पर बोर्ड की लापरवाही, जल्दबाजी और तकनीकी चूकों ने उस पुल को ही ढहा दिया है। नतीजा यह है कि 4,04,319 छात्र, यानी हर चौथा बच्चा, बोर्ड से अपनी कॉपी मांग रहा है। यह वह सामूहिक अविश्वास है,जिसने सीबीएसई के प्रति विश्वास की सारी हदें पार कर दी हैं। यह अविश्वास बच्चों में गंभीर तनाव, मानसिक दबाव और सिस्टम से नफरत पैदा कर रहा है। यह नफरत उनके कॉलेज, करियर और पूरे भविष्य के लिए नुकसानदेह है।
इस साल 12वीं में 17,68,962 छात्र बैठे। रिजल्ट के बाद 22.85 प्रतिशत छात्रों ने 11,31,960 स्कैन कॉपियों के लिए आवेदन किया। इससे पहले के वर्षों में यह आंकड़ा 2-3 प्रतिशत रहता था। इस आंकड़े का इस वर्ष 22 प्रतिशत से ऊपर पहुंचना बताता है कि इस बार कुछ बहुत गलत हुआ है।
इस संकट की जड़ ओएसएम को लागू करने की हड़बड़ी में है। कापियां स्कैन करने की वजह से इस बार मूल्यांकन एक महीने की देरी से शुरू हुआ। समय कम बचा तो दबाव बढ़ा। शुरुआत में पोर्टल भी धीमा चला। टारगेट पूरा करने के लिए शिक्षकों को रोज 12 से 15 कॉपियां जांचनी पड़ीं।
नियम था कि धुंधली यानी ब्लर स्कैन कॉपी रिजेक्ट कर दोबारा स्कैन कराई जाए। मगर दो दिन का काम बचाने के लिए कई केंद्रों पर ब्लर कॉपी ही जांच दी गई। ऐसी कॉपी पर छात्रों को शून्य अंक मिले, या बहुत कम अंक, या परीक्षक ने अंदाज से नंबर दे दिए। दो दिन बचाने के लिए किसी किसी बच्चे का पूरा साल बर्बाद कर दिया गया। इस गफलत में कई बच्चों को पूरा पेपर हल करने के बाद भी नंबर कम मिले।
ओएसएम से पहले तीन स्तरीय मैन्युअल क्रॉस-चेक था। दो इवैल्यूएटर आपस में कॉपियां बदलकर जांचते थे। फिर असिस्टेंट हेड एग्जामिनर और हेड एग्जामिनर रैंडम चेक करते थे। गलती की गुंजाइश नहीं बचती थी। नई व्यवस्था में यह सुरक्षा कवच हटा दिया गया। कंप्यूटर तय कर रहा है कि कॉपी किसे मिलेगी। डबल वेरिफिकेशन बंद। तकनीक पर आंख मूंदकर भरोसा किया गया और मानवीय विवेक को बाहर कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि कई बच्चों की कापियां ही ढंग से नहीं जांची जा सकी,बच्चों ने जब पुनर्मूल्यांकन के लिए अपनी स्कैन कापियां मांगी तो उन कापियों में ऐसी ऐसी गलतियां सामने आयीं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कई ब्लर कापियों में अंदाज से नंबर दिए गए तो कहीं शून्य नंबर दे दिया गया। वहीं एक होनहार छात्र वेदांत श्रीवास्तव की तो पूरी उत्तर पुस्तिका ही बदल दी गयी।
12वीं के छात्र वेदांत ने एक्स पर लिखा: “I am a CBSE Class 12 student. After receiving unexpectedly low marks in Physics, we applied for photocopies… Today we received the copies. And I am shattered because the Physics answer sheet uploaded by CBSE is not mine”.
वेदांत ने सीबीएसई को ईमेल किया, एक्स और इंस्टाग्राम पर वीडियो डाला। पोस्ट वायरल हुई तो उसे न्याय नहीं, गालियां मिलीं। वेदांत के भाई सिद्धांत कहते हैं, “कई लोगों ने हमें बहुत ट्रोल किया। हमें पाकिस्तानी तक कह दिया। कई न्यूज़ एंकर ने बिना वेरीफ़ाई किए हमें पाकिस्तानी कहना शुरू कर दिया।” सोचिए, एक बच्चा अपनी कॉपी मांग रहा है और जवाब में उसे ‘एंटी नेशनल’ कहा जा रहा है। और तो और दूरदर्शन के न्यूज एंकर अशोक श्रीवास्तव तो इस बच्चे को पाकिस्तानी कहने से भी नहीं चूके। यह मानसिक प्रताड़ना किसी भी किशोर को तोड़ने के लिए काफी है,जबकि उसकी तो कहीं कोई गलती भी नहीं थी।
आखिरकार सीबीएसई को गलती माननी पड़ी। बोर्ड ने वेदांत को जवाब दिया: “Dear Vedant, Thank you for bringing your concern regarding your Physics answer book to our attention. Upon review, the matter has been examined, and the correct copy of your answer book has been sent to your registered email address. Necessary action for updating your result…”
वेदांत को न्याय मिल गया। पर वह पहली गलत कॉपी किसकी थी? उस दूसरे अज्ञात छात्र का क्या हुआ? क्या उसे भी न्याय मिला? सीबीएसई की एक गलती दो बच्चों का भविष्य एक साथ खराब कर सकती थी। एक को तो न्याय मिल गया पर जब तक बोर्ड उस दूसरे बच्चे को ढूंढकर सार्वजनिक रूप से न्याय नहीं देता, संशय बना रहेगा और उन दूसरे बच्चों के मन में तो असमंजस ही बना रहेगा जिन्होंने बोर्ड से अपनी कापी नहीं मंगवाई।
यह व्यवस्था गरीब बच्चों के लिए तो और क्रूर है। सीबीएसई से जवाहर नवोदय विद्यालय के वे बच्चे भी परीक्षा देते हैं जो बस्तर, लद्दाख, अरुणाचल के दूरदराज गांवों से आते हैं। पिता खेतिहर मजदूर, मां मनरेगा में काम करती है। महीने की कमाई 4-5 हजार रुपये। रिजल्ट के बाद जब उन्हें लगता है कि अंक गलत हैं, तो बोर्ड कहता है,100 रुपये प्रति विषय दो, तब कॉपी दिखाएंगे। पांच विषय के 500 रुपये। (यह भी तब हुआ जब सीबीएसई की गलती को बच्चों ने पकड़ना शुरू किया और दनादन पुनर्मूल्यांकन के आवेदन आने लगे तथा भारी मूल्यांकन फीस का विरोध होने लगा) इससे पहले यह शुल्क 700 रुपए प्रति विषय था और पांच विषय के लिए कुल 3500 रुपए सिर्फ स्कैन्ड कापी के।
जब कापियों में व्यापक स्तर पर गड़बड़ियां सामने आ रही हैं तब यह प्रश्न पूछना तो आवश्यक है कि क्या न्याय सिर्फ उनके लिए है जिनके पास 500 रुपये हों? सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि उत्तर पुस्तिका सूचना है और आरटीआई में 2 रुपये प्रति पेज पर मिलनी चाहिए। फिर 100 रुपये भी क्यों? यह शुल्क नहीं, गरीब के भरोसे पर लगाया गया जुर्माना है। यह शुल्क बच्चों में व्यवस्था के प्रति गुस्सा और नफरत पैदा कर रहा है।
तकनीकी तौर पर बोर्ड लाख सफाई दे और वह सही भी हो सकता है पर जब 4 लाख बच्चे शक कर रहे हों तो सिर्फ सफाई से भरोसा नहीं लौटता। बोर्ड 2025 में खुद मान चुका है कि पुनर्मूल्यांकन के बाद 4632 मामलों में अंक बढ़े और 214 शिक्षकों पर कार्रवाई हुई। हर साल 12,000 से 13,000 छात्रों के अंक बढ़ते हैं। ये सिर्फ वे हैं जिन्होंने फीस देकर अपील की लेकिन जिनकी आर्थिक स्थिति अपील करने की नहीं थी उनका क्या?
होना तो यह चाहिए कि रिजल्ट के साथ हर छात्र को डिजीलॉकर पर निशुल्क स्कैन्ड कॉपी मिले। यह उनका अधिकार है। खासकर नवोदय, केवी और सरकारी स्कूलों के बच्चों के लिए लेकिन 11लाख 31 हजार आवेदन बता रहे हैं कि भरोसा टूट चुका है।
दूसरा, तकनीक रहे पर मानवीय विवेक भी रहे। ओएसएम में डबल चेक सिस्टम तुरंत बहाल हो। कंप्यूटर गलती कर सकता है, बारकोड बदल सकता है। दो शिक्षकों का क्रॉस-चेक वेदांत जैसे केस रोक देगा।
तीसरा, शिक्षकों पर अमानवीय दबाव बंद हो। एक महीने की देरी के बाद 15 कॉपी रोज का कोटा मूल्यांकन की हत्या है। ब्लर कॉपी रिजेक्ट करने का नियम जमीन पर लागू हो।
चौथा और सबसे जरूरी जवाबदेही तय हो। तकनीकी गड़बड़ी कहकर पल्ला झाड़ना बंद हो। जिसने ब्लर कॉपी जांची, जिसने बच्चों की कापियां बदली उस पर सख्त कार्रवाई हो।
सीबीएसई ने आधुनिक बनने की कोशिश की। मगर तकनीक जब मानवीय जवाबदेही को खा जाए तो वह विकास नहीं, विनाश बन जाती है। ओएसएम का मकसद गति और निष्पक्षता था। पर जल्दबाजी और क्रॉस-चेक खत्म करने से 4 लाख बच्चों को तनाव, अवसाद और सिस्टम से नफरत मिली है। यह नफरत उनके भविष्य के लिए जहर है।
22.85 प्रतिशत छात्र गलत नहीं हो सकते। आज हर चौथा बच्चे ने कॉपी दिखाने के लिए आवेदन किया है,तो आसानी से समझा जा सकता है कि व्यवस्था कितनी बीमार है। 17 लाख 68 हजार बच्चों का भरोसा तब लौटेगा जब दिल्ली से दंतेवाड़ा तक के हर उस बच्चे को अपनी कॉपी देखने को मिले,जिसने यह परीक्षा दी है,वह भी बिना किसी शुल्क के। साथ ही यह भी सुनिश्चित हो कि बच्चे को न्याय मांगने पर अशोक श्रीवास्तव और उनके जैसे लोगों की गाली न खानी पड़े।
हमारी संस्कृति और हमारे देश में विद्यालय को शिक्षा का मंदिर माना जाता है,पर यह मंदिर तभी तक पवित्र है जब तक वहां हर बच्चे के लिए न्याय की घंटी एक जैसी बजे। वरना तकनीक कितनी भी उन्नत हो, भरोसे की इमारत ढह जाएगी और उस मलबे में सबसे पहले दबेगा वेदांत जैसे लाखों बच्चों का भविष्य। (विभूति फीचर्स)


