नई दिल्ली
मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) को लेकर चल रहे राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए चुनाव आयोग की प्रक्रिया को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया है। अदालत ने साफ कहा कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कराना चुनाव आयोग का अधिकार है और इस प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी खामी नहीं पाई गई। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद विपक्ष के उन आरोपों को बड़ा झटका माना जा रहा है, जिनमें एसआईआर प्रक्रिया को मनमाना और असंवैधानिक बताया जा रहा था।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए किसी प्रक्रिया को “अल्ट्रा वायर्स” या अवैध नहीं कहा जा सकता कि वह सामान्य प्रक्रिया से अलग हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग ने कानून के दायरे में रहकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल किया है और उसकी शक्तियां पूरी तरह बरकरार रहेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आधार कार्ड समेत 11 दस्तावेजों को स्वीकार किए जाने के बाद यह कहना गलत होगा कि आयोग द्वारा मांगे गए दस्तावेज मनमाने हैं। अदालत ने दो टूक कहा कि जहां आयोग को किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह होगा, वहां उसे कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जा सकता है। कोर्ट ने माना कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और वैधानिक प्रावधानों का पालन किया गया है।
इस फैसले को चुनावी राजनीति के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा था कि बड़े पैमाने पर मतदाता सूचियों की जांच से मतदाताओं को परेशान किया जा सकता है, जबकि चुनाव आयोग का तर्क था कि फर्जी और अपात्र नाम हटाने के लिए यह जरूरी है। अब सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने के बाद चुनाव आयोग को बड़ी कानूनी मजबूती मिल गई है।
फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। भाजपा ने इसे विपक्ष की “नैतिक और संवैधानिक हार” बताया है, जबकि विपक्षी दलों के सामने अब इस मुद्दे पर नई रणनीति बनाने की चुनौती खड़ी हो गई है।


